Friday, October 6, 2017

भारत-चीन सीमा पर अभी बहुत कुछ करने की जरूरत


भारत और चीन के बीच जून से अगस्त तक डोकलाम विवाद को लेकर चली तनातनी के बीच दोनों देशों के बीच चली शाब्दिक तल्खी में चीन ने भारत को नतीजे भुगतने की जब धमकी दी तो भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने यह बयान दिया था कि भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है। उन्होंने साफ संकेत दिया था कि भारत-चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध के बाद स्थतियां काफी बदल चुकी है और भारत आज की तारीख में सामरिक दृष्टिमाना कि हम पहले से मजबूत हैं
भारत और चीन के बीच जून से अगस्त तक डोकलाम विवाद को लेकर चली तनातनी के बीच दोनों देशों के बीच चली शाब्दिक तल्खी में चीन ने भारत को नतीजे भुगतने की जब धमकी दी तो भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने यह बयान दिया था कि भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है। उन्होंने साफ संकेत दिया था कि भारत-चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध के बाद स्थतियां काफी बदल चुकी है और भारत आज की तारीख में सामरिक दृष्टि से उतना कमजोर नहीं है, जितना चीन उसे समझ रहा है।

कई मायनों में देखा जाए तो जेटली का यह बयान सही भी है। आज भारत ने आर्थिक और औद्योगिक विकास के साथ सामरिक दृष्टि से भी तकनीकी रूप से काफी तरक्की की है और वह धीरे धीरे दुनिया की मजबूत सामरिक ताकतों में शुमार किया जाने लगा है। फिर भी सवाल उठ रहा है कि चीन के परिप्रेक्ष्य में क्या हम उतना मजबूत हैं, जितना हमें होना चाहिए? यह सवाल हमेशा से रक्षा विशेषज्ञों के बीच में चर्चा का विषय भी रहा है।  

आज के हालात में भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की नजर से देखें तो अकसाई चीन और अरुणाचल प्रदेश को लेकर दोनों देशों के बीच लम्बे अरसे से विवाद चला आ रहा है। दोनों देशों से सटी अन्तरराष्ट्रीय सीमा की भौगोलिक स्थितयां इस विवाद में अहम कड़ी हैं। जिन भौगोलिक परिस्थितयों में भारत को चीन से मुकाबले के लिए खुद को तैयार करना था, उस दिशा में क्या तेजी से काम हुआ है,यह लाख टके का सवाल है। हालांकि भारत ने चीन की सीमा तक अपने संसाधन बढ़ाए हैं। अरुणाचल प्रदेश से असम तक और लेह लद्दाख से सटी सीमा तक काफी कुछ आधारभूत संरचनाएं विकसित की गई है, लेकिन इनकी धीमी गति हमेशा से चिंता का विषय बनी हुई है। मसलन भारत-चीन सीमा से सटे इलाकों में भारत को वर्ष 2012 तक 73 सड़कों का विकास करना था, लेकिन आंकड़ा 21 तक ही पहुंच पाया और अब इस काम को करने की समय सीमा भी वर्ष 2019-20 तक बढ़ाई जा चुकी है। इसी तरह पहाड़ी व दुर्गम इलाकों में ऑपरेशनल तैयारियों को बेहतर ढंग से अमलीजामा पहनाने के लिए गठित की गई भारतीय थल सेना की माउंटेन स्ट्राइक कोर की गति भी उतनी तेज नहीं है, जितना तेज उसे होना चाहिए था। कोर आज भी समग्र संसाधनों से लैस नहीं हो पाई है। लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि भारत चीन के मुकाबले खुद को कमजोर पाता है। अरुणाचल प्रदेश और असम के अग्रिम इलाकों में हवाई पट्टियों का विकास और आज की तारीख में वायुसेना की रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले सुखोई-30 विमानों की स्क्वाड्रनों की भारत-चीन सीमा पर मौजूदगी भारत की सामरिक तैयारियों में मजबूती को आश्वस्त करती है। इसके अलावा इसी साल शुरू हुए ढोला-सदिया ब्रिज, जिले असम के प्रमुख लोक गायक भूपेन हजारिका के नाम पर समर्पित किया गया है, ने भी पूर्वोत्तर राज्यों में सीमा तक सेना की पहुंच को सुगम बनाने का काम किया है। ऐसे में जानकार कहते हैं कि भारत ने धीरे धीरे ही सही, चीन को साधने की सामरिक तैयारी को योजनाबद्ध रूप से पूरा करने का प्रयास किया है, लेकिन अभी इस दिशा में बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। से उतना कमजोर नहीं है, जितना चीन उसे समझ रहा है। 

कई मायनों में देखा जाए तो जेटली का यह बयान सही भी है। आज भारत ने आर्थिक और औद्योगिक विकास के साथ सामरिक दृष्टि से भी तकनीकी रूप से काफी तरक्की की है और वह धीरे धीरे दुनिया की मजबूत सामरिक ताकतों में शुमार किया जाने लगा है। फिर भी सवाल उठ रहा है कि चीन के परिप्रेक्ष्य में क्या हम उतना मजबूत हैं, जितना हमें होना चाहिए? यह सवाल हमेशा से रक्षा विशेषज्ञों के बीच में चर्चा का विषय भी रहा है।

आज के हालात में भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की नजर से देखें तो अकसाई चीन और अरुणाचल प्रदेश को लेकर दोनों देशों के बीच लम्बे अरसे से विवाद चला आ रहा है। दोनों देशों से सटी अन्तरराष्ट्रीय सीमा की भौगोलिक स्थितयां इस विवाद में अहम कड़ी हैं। जिन भौगोलिक परिस्थितयों में भारत को चीन से मुकाबले के लिए खुद को तैयार करना था, उस दिशा में क्या तेजी से काम हुआ है,यह लाख टके का सवाल है। हालांकि भारत ने चीन की सीमा तक अपने संसाधन बढ़ाए हैं। अरुणाचल प्रदेश से असम तक और लेह लद्दाख से सटी सीमा तक काफी कुछ आधारभूत संरचनाएं विकसित की गई है, लेकिन इनकी धीमी गति हमेशा से चिंता का विषय बनी हुई है। मसलन भारत-चीन सीमा से सटे इलाकों में भारत को वर्ष 2012 तक 73 सड़कों का विकास करना था, लेकिन आंकड़ा 21 तक ही पहुंच पाया और अब इस काम को करने की समय सीमा भी वर्ष 2019-20 तक बढ़ाई जा चुकी है। इसी तरह पहाड़ी व दुर्गम इलाकों में ऑपरेशनल तैयारियों को बेहतर ढंग से अमलीजामा पहनाने के लिए गठित की गई भारतीय थल सेना की माउंटेन स्ट्राइक कोर की गति भी उतनी तेज नहीं है, जितना तेज उसे होना चाहिए था। कोर आज भी समग्र संसाधनों से लैस नहीं हो पाई है। लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि भारत चीन के मुकाबले खुद को कमजोर पाता है। अरुणाचल प्रदेश और असम के अग्रिम इलाकों में हवाई पट्टियों का विकास और आज की तारीख में वायुसेना की रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले सुखोई-30 विमानों की स्क्वाड्रनों की भारत-चीन सीमा पर मौजूदगी भारत की सामरिक तैयारियों में मजबूती को आश्वस्त करती है। इसके अलावा इसी साल शुरू हुए ढोला-सदिया ब्रिज, जिले असम के प्रमुख लोक गायक भूपेन हजारिका के नाम पर समर्पित किया गया है, ने भी पूर्वोत्तर राज्यों में सीमा तक सेना की पहुंच को सुगम बनाने का काम किया है। ऐसे में जानकार कहते हैं कि भारत ने धीरे धीरे ही सही, चीन को साधने की सामरिक तैयारी को योजनाबद्ध रूप से पूरा करने का प्रयास किया है, लेकिन अभी इस दिशा में बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।
#Indo-Chinadispute #IndiaChinarelations #Doklam #Chikenneck

Thursday, October 5, 2017

जब खालिस्तान के निशाने पर आया राजस्थान

दूधिए ने पकड़वाए आतंकी

लगभग 23 साल बाद राजस्थान का संगीन अपहरण कांड गुरुवार को पूरी दुनिया में एक बार सुर्खियों में आ गया। यह है राजेंद्र मिर्धा अपहरण कांड और इस मामले में जयपुर की एक स्थानीय अदालत ने खालिस्तान लिब्रेशन फोर्स के एक आतंकी को दोषी करार दिया है। आतंकी पंजाब के लुधियाना में भटारी गांव के मूल निवासी हरनेक सिंह को अदालत कल सजा सुनाएगी। इस मामले में एक दम्पती दयासिंह लाहोरिया व उसकी पत्नी सुमन सूद को अदालत लगभग 13 साल पहले ही सजा सुना चुकी है।
इस मामले ,का रोचक पहलू ये है कि पुलिस एक दुधिए की मदद से आतंकियों तक पहुंची थी। दूधिए की सूचना के आधार पर न सिर्फ अपहृत राजेंद्र मिर्धा को मुक्त करवाया गया, बल्कि पुलिस और आतंकियों की मुठभेड़ में खालिस्तान लिब्रेशन फोर्स का एक दुर्दांत आतंकी नवनीतसिंह कादिया मारा गया और दो अन्य मौके से फरार हो गए। खासियत की बात यह है कि कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे और देश के पहले सबसे चर्चित आर्थिक घोटाले हर्षद मेहता कांड की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति के मुखिया रामनिवास मिर्धा के पुत्र राजेंद्र का पंजाब के दुर्दांत आतंकी देवेंद्रसिंह भुल्लर की रिहाई की मांग पर अपहरण करने वाले आतंकियों का सुराग देने वाले दूधिए को पुलिस को वैसी ही सुरक्षा प्रदान करनी पड़ी, जैसी आतंकी खतरे की स्थिति में आज के राजनेताओं को प्रदान की जाती है।
दरअसल, व्यवसायी और पिता की राजनीतिक छवि से कोसों दूर राजेंद्र का पंजाब के आतंकियों ने 17 फरवरी 1995 को उस वक्त अपहरण कर लिया था, जब वे मोर्निग वॉक के लिए अपने घर से निकले। सफेद मारूति कार में आए तीन आतंकियों ने हथियार के बल पर राजेंद्र मिर्धा को उठाया और जयपुर के ही मोडल टाऊन, मा्लवीय नगर में बंधक बनाकर लगभग नौ दिन तक रखा। इन लोगों ने अपहरण के लगभग एक डेढ़ घंटे बाद ही राजेंद्र की पत्नी उदयरानी मिर्धा को फोन करके कहा कि राजेंद्र उनके कब्जे में हैं। वे उन्हें दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर 18-19 जनवरी को पकड़े गए देवेंद्र सिंह भुल्लर की रिहाई तक नहीं छोड़ेंगे। आतंकियों ने मामले की जानकारी पुलिस को देने या फोन को टेप करवाने की स्थिति में राजेंद्र को शारीरिक क्षति पहुंचाने की धमकी भी दी। उदयरानी ने अपने देवर और राजस्थान सरकार में मंत्री रहे हरेंद्र मिर्धा को अपहरण के बारे में जानकारी दी। उन्होंने जयपुर के अशोक नगर थाने में मामला दर्ज करवा दिया, लेकिन पुलिस के हाथ खाली ही रहे। इसी दौरान मालवीय नगर इलाके के मोडल टाउन में दूध की सप्लाई करने वाले हनुमान बागड़ा को मकान संख्या बी-117 में रहने वाले लोगों के बारे में संदेह हुआ। इन लोगों ने कुछ दिन पहले ही प्रोपर्टी डीलर्स के जरिए यह मकान एक स्था्नीय निवासी से खरीदा था और रजिस्ट्री के लिए दिल्ली के अलग अलग बैंकों से 45-45 हजार के तीन डिमांड ड्राफ्ट बनवाए थे। पुलिस ने इस मकान पर नजर रखी और जब भी पुलिस वहां जाती तो वहां रहने वाली महिला कहती कि उसका बेटा बीमार है, इसलिए वे लोग बाहर नहीं निकलते। दूधिए की सूचना पुलिस को सही लगी और आखिर पुलिस ने दल बल के साथ इस मकान पर 25 फरवरी को दबिश दी तो आतंकियों ने गोलाबारी शुरू कर दी। इस दौरान पुलिस की गोली से एक कुख्यात खालिस्तानी आतंकी कादिया मारा गया और दो अन्य भाग निकले। पुलिस ने राजेंद्र को सकुशल मुक्त करवा लिया। फरार हुए आतंकी दयासिंह लोहारिया और उसकी पत्नी सुमन की तलाश शुरू हुई, लेकिन वे दोनों अमरीका भाग गए। वहां से अवैध रूप से कनाडा भागने की कोशिश कर रहे दम्पती को अमरीकी पुलिस ने मिनोसोटा हवाई अड्डे पर 3 अगस्त 1995 को दबोच लिया। लम्बी कानूनी प्रक्रिया के बाद अमरीकी अदालत के आदेश पर दोनों को प्रत्यापित किया गया। लेकिन मौके से भाग निकला आतंकी हरनेक सिंह पुलिस की गिरफ्त से दूर था। इस दौरान लाहोरिया दम्पती पर जयपुर की अदालत में मामला शुरू हुआ। पहले इन पर टाडा की धाराएं लगाई गई और अजमेर में स्थित विशेष टाडा कोर्ट में सुनवाई होती रही, लेकिन उनके वकीलों ने कहा कि प्रत्यर्पण की शर्तों के हिसाब से टाडा मे मामला नहीं चलाया जा सकता तो मामला फिर जयपुर की अदालत को भेजा गया। अदालत ने लम्बी सुनवाई के बाद 20 अक्टूबर 2004 को दोनों को दोषी माना। दयासिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई गई। सुमन सूद को सात साल की जेल हुई। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील की तो सुमन को भी उम्र कैद की सजा सुनाई गई, लेकिन मौके से भाग निकला हरनेकसिंह पुलिस की पकड़ से दूर था। उसे पंजाब पुलिस ने 2004 मे गिरफ्तार किया। उसे  फरवरी 2007 को राजस्थान लाकर मिर्धा अपहरण मामले में मुकदमा चलाया गया, तब से हरनेक जेल में है। राजस्थान उच्च न्यायालय के निर्देश पर जयपुर की अपर जिला न्यायाधीश संख्या 3 की अदालत ने लगातार सुनवाई की और 23 सितम्बर को सुनवाई पूरी होने के बाद गुरुवार को हरनेक को दोषी करार दिया गया। उसे शुक्रवार को सजा सुनाई जाएगी।

दुधिए के साथ चलते थे गनमैन

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि राजेंद्र मिर्धा का अपहरण करने के बाद आतंकियों ने उसकी पत्नी को फोन किया, लेकिन उनका सुराग लगाना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में दूधिए हनुमान बागड़ा की सूचना ने सारे मामले की तह में जाने की राह प्रशस्त की। चूंकि 1995 में इस घटना ने पंजाब में आतंकवाद के फिर खड़ा होने का खतरा पैदा कर दिया था, ऐसे में बागड़ा को तब तक पुलिस ने सुरक्षा प्रदान की, जब तक मामला मंजिल तक नहीं पहुंचा। दूधिए के साथ हर वक्त पुलिस के गनमैन साये की तरह चलते थे।

परिवार नहीं करना चाहता बात

दूधिए का परिवार आज भी जयपुर के जगतपुरा इलाके में रहता है, लेकिन घटना के बाद परिवार को मिली धमकियों से उनका परिवार आज भी इतना आतंकित है कि इस मामले पर कोई बात नहीं करना चाहता। इसके अलावा करीब तीन साल पहले बागड़ा पर हुए ऐसिड अटैक ने भी परिवार के हौंसले पस्त कर रखे हैं। हालांकि अब बागड़ा को पुलिस सुरक्षा नहीं है,लेकिन कल आने वाले फैसले के मद्देनजर परिवार में खुशी भी है तो भय भी है।

मिर्धा का हो चुका निधन

जयपुर के् पोश इलाके सी स्कीम में आजाद मार्ग पर रहने वाले राजेंद्र मिर्धा का वर्ष 2009 में हार्ट अटैक से निधन हो गया था। उनके पिता रामनिवास मिर्धा का निधन भी हो चुका है, लेकिन अपहरण का मामला दर्ज करवाने वाले उनके भाई हरेंद्र मिर्धा आज भी राजस्थान की कांग्रेस राजनीति में सक्रिय हैं। वे 1998 में बनी अशोक गहलोत सरकार में काबिना मंत्री रह चुके हैं। आज मारवाड़ की कांग्रेस राजनीति के पर्याय रहे नागौर जिले में अहम कड़ी बने हुए हैं।

Wednesday, May 18, 2016

राफेल पर रार और तेजस की दरकार


 --सुरेश व्यास
स्वदेश निर्मित पहले हल्के लड़ाकू विमान तेजस को जो वायुसेना आज तक कभी ओवरवेट (भारी), अंडर पॉवर (कमजोर) और ओबसोलेट (बेकार) और यहां तक कि तीन टांग वाला चीता कहती रही और उसकी लगातार अनदेखी के कारण न सिर्फ तीन दशक तक यह परियोजना पूरी नहीं हो सकी, उसी वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल अरूप राहा के मुंह से तेजस की तारीफ चौंकाने वाली है। रेंग-रेंग कर पूरी होने की ओर बढ़ रही तेजस परियोजना के तहत पहला स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान वर्ष 2001 में सामने आया। फिर भी अब तक वायुसेना में अपना मुकाम नहीं बना पाया। पहली उड़ान के लगभग 15 साल बाद कोई तेजस उड़ाने वाले राहा पहले वायुसेनाध्यक्ष हैं। राहा ने न सिर्फ तेजस उड़ाया, बल्कि आधे घंटे की उड़ान की मारक क्षमता को परखा। इसके बाद उनका यह कहना कि यह वायुसेना की जरूरतों के हिसाब से एक बेहतरीन विमान है, विमान निर्माता सरकारी कम्पनी हिन्दुस्तान एयरोनोटिकल्स लिमिटेड के लिए जरूर सुखदायी है। फिर भी सवाल उठ रहा है कि तेजस की अब तक 3050 परीक्षण उड़ानों के बाद आखिर वायुसेना का हृदय परिवर्तन अब क्यों हुआ?
क्या यह प्रधानमंत्री मोदी के 'मेक इन इंडियाÓ कार्यक्रम का नतीजा है? क्या हाल ही बहरीन में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय एयर शो में तेजस के अद्भुत प्रदर्शन की बदौलत वायुसेना की राय बदली है? या फिर क्या बुढिय़ाए जा रहे मिग श्रेणी के विमानों के कारण लगातार घट रही वायुसेना की लड़ाकू विमान स्क्वाड्रन और राफेल सौदे में हो रही देरी ने वायुसेना को इसके लिए मजबूर किया है?
कहने को तो तेजस परियोजना को आई तेजी को मेक इन इंडिया से जोड़ा जा सकता है, लेकिन जब हमारे सामने मोदी का फ्रांस के राष्ट्रपति होलांद के साथ गत जनवरी में 26 राफेल भारी कीमत में खरीदने का करार हो तो, इसे मानने का मन नहीं करता। वह भी उस तथ्य की रोशनी में कि जिस फ्रांस से पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने वर्ष 2007 में 126 राफेल करीब 48 हजार करोड़ रुपए में खरीदने की मंजूरी दी थी, उसी राफेल निर्माता कम्पनी डासॉल्ट से हम मात्र 36 राफेल विमान 65 हजार करोड़ रुपए में खरीदने के लिए राजी हो रहे हैं।
रुपए का अवमूल्यन और उत्पादन लागत बढऩे के तर्क अपनी जगह पर हो सकते हैं, लेकिन क्या फ्रांस से सौदे की आधी राशि भारत में निवेश के वादे के साथ महंगे राफेल खरीदना क्या उस देश के लिए उचित हैं, जहां बुंदेलखण्ड में लोग घास की रोटी खाने के लिए मजबूर हो या कोई आदमी जेब में रोटी का टुकड़ा लिए भूख से मर जाए और महाराष्ट्र सरीखे राज्य में घनी आबादी पानी की बूंद के लिए तरस जाए।
घास की रोटी बनाम राफेल
इन परिस्थितियों में जब राफेल की अत्यधिक कीमत पर सवाल के जवाब में रक्षा राज्यमंत्री राव इंद्रजीत सिंह यह कह दें कि जब देश की सीमाएं सुरक्षित होगी और जब हमारा आसमां सुरक्षित होगा, तभी देश विकास कर सकता है। यदि आपके पास सुरक्षा नहीं होगी तो घास की रोटी भी नहीं मिलेगी, तो आसानी से समझा जा सकता है कि सरकार किस मजबूरी मे फंसी है।
फिर भी असल सवाल तो वायुसेना का है, जिसकी वजह से तेजस परियोजना अटकती-भटकती रही है। आगामी एक जुलाई को चार विमानों के साथ वायुसेना में तेजस की पहली स्क्वाड्रान बेंगलूरु स्थित एचएएल परिसर में स्थापित होनी हैै। ऐसे में वायुसेनाध्यक्ष के मुंह से तारीफ का सीधा सा मतलब है कि वायुसेना अब ज्यादा इंतजार करने की स्थिति में नहीं है।
हालांकि राफेल जैसे मीडियम मल्टीरोल कॉम्बेट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसी) दुश्मन के इलाके में अंदर तक जाकर मार करने के लिए वायुसेना की महती जरूरत है, लेकिन जैसे जैसे उसके पास लड़ाकू विमानों की कमी होती जा रही है और कुल स्कवाड्रन की संख्या 42 से घटकर 33 से 35 के बीच रह गई है तो तेजस उसकी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने की मजबूरी भी हो सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि तेजस वायुसेना की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, लेकिन मिग श्रेणी के विमानों के बाद सुखोई-30 एमकेआई, मिराज और जगुआर जैसे विमानों के बीच की खाई पूरी करने के लिए तेजस न सिर्फ एक बेहतर नभचर साबित हो सकता है, बल्कि एयर टू ग्राउंड हमलों के लिए सहज उपलब्ध एकमात्र बेहतरीन विकल्प भी है।
तेजस की उपयोगिता यूं भी बढ़ जाती है कि उसके अपग्रेडेड संस्करण भी परीक्षण में खरे उतर चुके हैं। वायुसेना ने अब तक तेजस में कुल 53 तरह की खामियां गिनाई थी और मिड एयर रिफ्यूलिंग जैसी सुविधा से भी इसे लैस कर दिया गया है तो वायुसेना के पास कहने को कुछ बचता नहीं है।
दरअसल, भारत सरकार और भारतीय वायुसेना 'घर का जोगी जोगणा, आण गांव का सिद्धÓ की तर्ज पर शुरू से तेजस की अनदेखी करते रहे हैं। सरकार ने जहां तेजस परियोजना के वित्त पोषण में हाथ खींचे रखे, वहीं वायुसेना के अधिकारी लगातार इसमें मीनमेख (खामियां) निकालते रहे। नतीजन विमान की री-डिजाइन करनी पड़ी और इससे लागत, समय, पैसा और इसके इंडक्शन में देरी हुई सो अलग।
तत्काल जरूरत भी है कारण
भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों का बेड़ा बढ़ाने की अहम जरूरत है। हालत यह है कि मिग-21 की विदाई के बाद भारत तो उस जैसे ही किसी विमान की तत्काल जरूरत है। नए विमान खरीदने के बारे में फैसला लेेने में लगातार देरी चिंता का सबब बनी हुई है।
एक की कीमत में छह तेजस
राफेल की अत्यधिक कीमत और सौदे की शर्तों में सत्ता परिवर्तन के साथ हुए बदलाव से भी विमान हासिल होने में देरी लाजिमी है। ऐसे में तेजस पर वायुसेना का भरोसा लौटा तो ताज्जुब नहीं है। वर्ष 2007 में फ्रांस से राफेल विमान खरीदने का फैसला हुआ और कुल 126 राफेल के लिए अनुमानित कीमत 10 से 12 बिलियन डॉलर यानी करीब 48 हजार करोड़ आंकी गई। इसके बाद से लगातार कीमत बढ़ती जा रही है। सरकार फैसला नहीं कर पा रही कि राफेल कितने और किस कीमत पर खरीदे जाएं?
पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान फ्रांस से 126 की बजाय सिर्फ 36 राफेल 65 हजार करोड़ रुपए में खरीदने का सौदा किया गया, लेकिन प्रत्येक राफेल की कीमत लगभग 1750 करोड़ रुपए पड़ रही है। कीमत इतनी ज्यादा कि इसकी कीमत में वर्तमान में भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता की रीढ़ की हड्डी बने सुखोई-30 एमकेआई जैसे दो या छह तेजस विमान खरीदे जा सकते हैं।
अभी यह पता नहीं है कि निगोसिएशन के बाद जब तक सौदा पटेगा, तब तक राफेल की कीमत कहां तक पहुंच जाएगी। फ्रांस की कम्पनी डासॉल्ट साल में अधिकतम 14 राफैल बनाकर दे सकती है, इस हिसाब से आज भी यदि राफेल की पहली खेप भारत को मिल जाए तो सभी 126 विमान तो वर्ष 2030 तक भी वायुसेना को प्राप्त नहीं हो पाएंगे।

Monday, May 16, 2016

पाकिस्तान के हालात और भारत की सामरिक चिंता

सामरिक मजबूती बनाम राजनीतिक नेतृत्व की इच्छाशक्ति
-सुरेश व्यास
कहते हैं कि  होश खो देने या पागलपन के कारण ही कोई झगड़ा फसाद होता है। घर-समाज और गलियों चौबारों के झगड़े भी आवेश के कारण होते हैं और निपट जाते हैं, लेकिन आज जो हालात पड़ोसी देशों में बन रहे हैं और जिस तरह से इन देशों में कूटनीतिक रास्तों से किसी ताकतवर देश का पिच्छलग्गू बनने या बनाने की की कोशिशें चल रही है, उसे देखते हुए भारत की सामरिक चिंता को कम नहीं आंका जाना चाहिए।

भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को खासकर इस नजरिए से देखा जाए और उसकी अमरीका को पटाए रखने के साथ चीन के साथ पिछले करीब एक दशक से चल रही गलबहियां और हाल ही भारत-पाक सीमा के निकट चीन की गतिविधियां वाकई चिंता पैदा करती है। चीन के साथ भारत का सीमा विवाद तो है ही, लेकिन जिस तरह पाकिस्तान ने कश्मीर के बहाने आतंक को पाल-पोस कर भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया है, वह भी भारत के लिए दुश्मन नम्बर वन ही बना हुआ है।

भारत की सरकारें पाकिस्तान के साथ हमेशा सौहाद्र्रपूर्ण सम्बन्धों की कोशिशें करती रही है, लेकिन इसके नतीजे क्या रहे, इसे आतंकी गतिविधियों को झेलने वाले लोगों के साथ देश की बाकी जनता से ज्यादा शायद हमारे हुक्मरान भी नहीं समझ पाए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर यात्रा से दोस्ती के संदेश के बाद जिस तरह कारगिल का युद्ध हुआ। मौजूदा प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी की गोपनीय व देश-दुनिया को चौंकाने वाली लाहौर यात्रा के बाद पठानकोट पर आतंकी हमला हुआ। ऐसे और भी कई उदाहरण मिल जाएंगे। आतंक से निपटने की बात अलग है और सामरिक दृष्टि से पाकिस्तान के प्रति सजग रहने की बात एकदम अलग है।

भारत की मौजूदा चिंता पाकिस्तान से पोषित आतंकवाद से निपटने के अलावा, पाकिस्तान की चीन के साथ बढ़ती नजदीकियां तो हैं ही, लेकिन जिस तरह चीन नेपाल सरीखे भारत के विश्वस्त पड़ोसी को भी झांसे में लेने की कोशिश कर रहा है, उससे लगता है कि अमरीका के बहाने चीन भारत को चौतरफा घेरने की कोशिश में पाकिस्तान के कंधे पर बंदूक रखने की चेष्टा में है। गरीब, कुचला-दबा पाकिस्तान पैसे के लिए अपना जमीर गिरवी रखने के लिए कुख्यात रहा है। अफगानिस्तान से रूसी सेना की विदाई के बाद भले ही तालिबान को सह देने की बात हो या अमरीका पर हुए सबसे बड़े 9/11 आतंकी हमले के दोषी ओसामा बिन लादेन को अपने यहां छिपाए रखने का दृष्टांत हो, पाकिस्तान ने पैसे के लिए कुछ भी करेगा वाली कहावत को चरितार्थ करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी।

अब चीन के साथ उसकी नजदीकियां और चीन की ओर से भारत से सटी सीमा पर अपनी सामरिका गतिविधियां बढ़ाए जाने का वाशिंगटन से हुए रहस्योद्घाटन भारत के लोगों के लिए चिंता का सबब है।

सवाल है कि क्या चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत पर हमला करने की तैयारी में है? संयुक्त राष्ट्र संघ के कायदों से बंधा चीन शायद खुद तो हमलावर नहीं होगा, लेकिन पाकिस्तान को उकसाने की उसकी सम्भावित नीति भी घातक सिद्ध हो सकती है।

इस चिंता से हमारे हुक्मरान कितना वाकिफ है, कह नहीं सकते, लेकिन भारतीय रक्षा सेनाओं में तो इसे लेकर खासी चिंता है और इससे निपटने की इनकी तैयारी भी नजर आती है। हाल ही अप्रेल माह में  भारतीय फौज ने एक बड़ा युद्धाभ्यास किया शत्रुजीत। इसका मकसद वैसे तो भारतीय फौज को भविष्य में होने वाले आणविक, जैविक और रासायनिक युद्ध से निपटने के लिए तैयार करना था, लेकिन असली चिंता थी पाकिस्तान का पागलपन। सवाल था कि पाकिस्तान ने खुदा न खास्ता कोई पागलपन  करके भारत की ओर परमाणु हथियार दाग दिए तो क्या होगा और इससे कैसे निपटा जाएगा?

पाकिस्तान का पागलपन भारतीय फौज को एकाएक नजर नहीं आया। दरअसल पाकिस्तान ने पिछले दिनों साठ किलोमीटर तक मार करने वाली नस्र (हत्फ-९) जैसी कम दूरी की मिसाइयों से परमाणु हमले की क्षमता हासिल की है। इसके अलावा सब किलोटन क्षमता के छोटी दूरी पर मार करने वाले अन्य परमाणु हथियार भी बनाए हैं। इन 'टेक्टिकल न्यूक्लियर वैपन (टीएनडब्ल्यू) को हाल ही अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी खतरनाक बताया था। पाकिस्तान वैसे तो दुनिया के सामने कहता रहा है कि वह परमाणु हमले की पहल नहीं करेगा, लेकिन जिस तरह पाकिस्तान में आतंकी संगठन मजबूत होते जा रहे हैं, उससे एक खतरा पाकिस्तानी परमाणु हथियार आतंकियों के हाथ में पडऩे का भी है। यह भी भारत की चिंता का सबब है। साथ ही हाल ही पाकिस्तान के हमलावर (ऑफेंसिव) युद्ध सिद्धांत और उसके लगातार टीएनडब्ल्यू की ओर केंद्रीत होने का खुलासा भी हुआ है। इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान अब भारत की ओर से हमला किए जाने का इंतजार नहीं करेगा। उसकी कोशिश होगी कि मौका पड़ते ही छोटा-मोटा हमला कर भारत के भूभाग पर कब्जा किया जाए, ताकि युद्धोपरांत इसे निगोशिएशन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके।


पाकिस्तान की हालत क्या है, यह किसी से छिपी हुई नहीं है। खुद वह आतंकी गतिविधियों का सामना कर रहा है। आए दिन वहां भी आतंकी निर्दोष लोगों का खून बहा रहे हैं। पाकिस्तान की आतंरिक स्थिति भी ठीक नहीं कही जा सकती। सिंध, पंजाब और बलूचिस्तान जैसे इलाकों में  कानून व्यवस्था नाम की चीज दिखाई नहीं देती। सिंध और पंजाब की प्रतिस्पर्धा और बलूचिस्तान में पख्तूनों की जंग, पाकिस्तान के आंतरिक रूप से अस्थिर होने का संकेत दे रही है। कहने को तो वहां निर्वाचित सरकार है, लेकिन दबदबा आज भी फौज का है। ऐसे में पाकिस्तान के आतंरिक हालात, विकट आर्थिक स्थिति, फौज का कट्टरपन और कूटनीतिक मोर्चे पर  'मुंह में राम बगल में छुरी वाली उसकी स्थिति भारत के लिए वाकई खतरा है।

पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति और नवगठित सामरिक नीतियों को समझने की कोशिश करते हुए भारतीय थल सेना ने युद्धाभ्यास 'शत्रुजीत में सेना की नवोदित आर्मर्ड, आर्टीलरी व इंफे्रंट्री इकाइयों ने न्यूक्लियर, बायोलोजिकल व केमिकल (एनबीसी) युद्ध के काल्पनिक माहौल में खुद को तैयार करने के लिए पसीना बहाया है। इस दौरान कम दूरी की मिसाइलों का भी प्राथमिकता से इस्तेमाल किया गया। सेनाओं के सामंजस्य को परखने और परमाणु युद्ध की स्थिति में सेना की ओर से बचाव व जवाब तथा थर्ड डाइमेंशन (हवाई मार्ग) से फौजी टुकडिय़ों को युद्ध के मैदान में उतारने की तैयारी को भी परखा गया। मथुरा स्थित सेना की पहली स्ट्राइक कोर की अगुवाई में 'ऑपरेशन शत्रुजीत नामक युद्धाभ्यास में कोर के ४० से ५० हजार जवान न्यूक्लियर, बायोलोजिकल व केमिकल (एनबीसी) हमले के काल्पनिक माहौल में परमाणु हथियारों का मुकाबला करने और दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए करीब डेढ़ माह तक पसीना बहाकर लौटे हैं।

जाहिर है, एक तरफ चीन का पाकिस्तान के नजदीक जाना, उसे आर्थिक व सामरिक मदद प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रदान करना और दूसरी ओर पाकिस्तान का वार डॉकट्रेन बदलने के साथ टीएनटी पर जोर देना, भारतीय फौज के लिए चुनौती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान को किसी भी ऐसी हरकत पर मुंहतोड़ जवाब देने में भारतीय सेना सक्षम है, लेकिन देश के राजनीतिक नेतृत्व को भी इन खतरों को भांप कर खुद को तैयार रखना होगा। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में भारतीय फौज की तैयारी का हश्र क्या होता है, यह देश वर्ष 2001 में भारतीय संसद पर आतंकी हमले के बाद 11 महीने तक चले ऑपरेशन पराक्रम में देख चुका है।

इस हकीकत को नकारा नहीं जा सकता कि पाकिस्तान के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, ऐसे में वह कोई भी पागलपन कर भी सकता है। सवाल है कि क्या हम उसके पागलपन का समय पर और सख्त जवाब दे पाएंगे या सेना का 'ऑपरेशन शत्रुजीत जैसा प्रयास कमजोर राजनीतिक इच्छा शक्ति के आगे बौना साबित हो जाएगा?

Thursday, October 15, 2015

अभिव्यक्ति की आजादी बनाम राजनीति

अभिव्यक्ति की रक्षा और राजनीति

सबसे पहले उदय प्रकाश और उनके करीब एक माह बाद पूर्व प्रधानमंत्री की भांजी नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी। अब तो जैसे देश के कलमकारों में अपने अपने पुरस्कार लौटाने की हौड़ सी मची है और लगभग दो दर्जन से ज्यादा कलमजीवी अपने पुरस्कार लौटा चुके हैं। बिना किसी वैचारिक भेद और दुराव के। सभी का एक ही विरोध है कि देश में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही है। शासन मौन है। बेगुनाह मारे जा रहे हैं। कलमकारों की अभिव्यक्ति पर ताला लगाने की कोशिश हो रही है और विरोध करने वालों को मौत के घाट उतारा जा रहा है। चाहे कर्नाटक के ख्यातनाम लेखक कुलबर्गी हो या फिर महाराष्ट्र के गोविन्द पनसारे और नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या।
कलमकारों के विरोध का यह एक तरीका है। आखिर देश की संस्कृति और समाज पर आफत के दौर में कलमकार अपने शब्दों के जरिए प्रतिकात्मक विरोध ही तो जता सकता है और शुरुआत में जब प्रसिद्ध साहित्यकार उदयप्रकाश ने सितम्बर माह के पहले पखवाड़े में अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाकर कुलबर्गी की हत्या का विरोध किया तो इसे प्रतीकात्मक विरोध के रूप में ही लिया गया। वह था भी प्रतिकात्मक विरोध ही, लेकिन इसके बाद नयनतारा सहगल ने दादरी में गोमांस के संदेह में एक अधेड़ को घर से बाहर निकाल कर पीट पीट कर मार दिए जाने और सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे लोगों की चुप्पी पर आपत्ति जताते हुए अपना पुरस्कार लौटाया। अगले दिन अशोक वाजपेयी सुर्खियों में आए और अब जैसे जैसे पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों-साहित्यकारों की संख्या बढ़ती जा रही है, वैसे वैसे इन साहित्यकारों को समर्थन और विरोध में कई धड़े सामने आ रहे हैं। सबसे ज्यादा मौका उन लोगों को मिला है, जो सोशल मीडिया को अपनी भड़ास निकालने का साधन ही समझ बैठे हैं और जिन लोगों की वजह से सोशल मीडिया पर भक्त और ...ड़वे जैस जुमले नमुदार हो रहे हैं।
दरअसल, कलमकारों का विरोध अपनी जगह है और राजनेताओं की ओर से उनका विरोध अपनी जगह। यह प्रतिष्ठापित तथ्य है कि आज तक जब जब देश और समाज के सामने कोई संकट या आफत आई है, कलमकारों ने मे प्रतिकात्मक रूप से विरोध दर्ज करवाया है। आखिर कलमकार जमात राजनेता तो हो नहीं सकती जो धरना प्रदर्शन करे? फिर भी इस बात में कोई दो राय नहीं कि अब जैसे जैसे पुरस्कार लौटाने की हौड़ मची है, उसे देखकर मंतव्य पर सवाल उठना लाजिमी है।
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के अलावा कांग्रेस नेता और स्तम्भकार शशि थरूर भी पुरस्कार लौटाने वालों के विरोध में खड़े नजर आ रहे हैं। अपनी बेबाकी के कारण जाने जाने वाले अभिनेता अनुपम खैर तो खुलेतौर पर इसे प्रधानमंत्री की छवि खराब करने की कोशिशों का हिस्सा बता चुके हैं। हालांकि उनकी पत्नी भाजपा की सांसद है, फिर भी उनका बयान अनुपम को बेबाकी के लिए पहचानने वाले लोगों को नहीं पचा।
सवाल पुरस्कार लौटाने या नहीं लौटाने का नहीं है। सवाल धार्मिक असहिष्णुता बढऩे पर मौन और मुखर होने का भी नहीं है। सवाल इस बात पर उठ रहा है कि जिस तरह राजनीति की तरह सोशल मीडिया पर भी भक्त और नास्तिक जैसे दो धड़े बनते जा रहे हैं और लेखकों के पक्ष और विपक्ष में विष वमन किया जा रहा है, वह देश में सांस्कृतिक साम्प्रदायिकता फैलाने की कोशिश से कम नहीं है। लोग उदयप्रकाश, नयनतारा और अशोक वाजपेयी के पुरस्कार लौटाने को राजनीति से प्रेरित बताते हैं। एक मंच से सवाल उठा कि नयनतारा को 1986 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और इससे दो साल पहले दिल्ली में सिक्खों का कत्लेआम हुआ तो उन्होंने राजीव गांधी के प्रधानमंत्रीत्व काल में पुरस्कार ग्रहण क्यों किया? लेकिन यह सवाल उठाने वाले भूल जाते हैं कि 1975 में अपनी बहन इंदिरा गांधी के आपातकाल लगाने के फैसले का सबसे पहले विरोध भी नयनतारा ने ही किया था।
न्याय की तराजू के पलड़े बराबर होने चाहिए। विरोध करने वाले लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि आपातकाल लगाए जाने के विरोध में राजनेताओं के साथ पत्रकारों और साहित्यकारों ने भी अपने तरीके से विरोध दर्ज करवाया था। जेल में भी डाले गए थे। उस वक्त तो इनकी सराहना की गई। आज सराहना करने वाले लोग सत्ता में है तो विरोध। क्यों भाई? क्या विरोध करने वाले दादरी में इखलाल मियां को मार दिए जाने को सही मानते हैं? क्या कर्नाटका में कुलबर्गी की हत्या को जायज ठहराते हैं? क्या महाराष्ट्र में ढोंगियों का विरोध करने वाले पनसारे व दाभोलकर को अपराधियों द्वारा दी गई सजा-ए- मौत वाजिब थी? यदि नहीं तो इस पर चुप्पी पर सवाल उठाना कैसे गलत हो सकता है। देश में सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। सोशल मीडिया ने लेखकों-पत्रकारों के अलावा एक और नई जमात खड़ी की है, जिसका काम अपने आकाओं को खुश करने के लिए ऊलजुलूल बातें फैलाना ही रह गया है। इस चक्कर में सोशल मीडिया के जरिए अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करने वाले, खासकर सत्ता विरोधी टिप्पणी करने वाले और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग इस धड़े के निशाने पर हैं। पत्रकार रवीश कुमार से ज्यादा इस दर्द को शायद कोई समझ नहीं पाए। जिस तरह रवीश को सोशल साइट्स पर गरियाया गया। उनके नाम की फेक आईडी बनाकर कमेंट्स कर उन्हें कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई, उससे इस नए खतरे को समझा जा सकता है। एक धड़ा बहन गया है जो सत्ता विरोधी आवाज सुनना ही नहीं चाहता। अभिव्यक्ति की आजादी को आजादी रहने दीजिए, इसे राजनीति का अखाड़ा मत बनाइए। हमारे देश की पहचान अनेकता में एकता है। मत अनेक हो सकते हैं, देश को एक ही रहने दीजिए, वरना आज एक सत्रह साल के बच्चे ने जिस तरह कुलबर्गी हत्याकाण्ड के विरोध में अपना पुरस्कार लौटाकर समाज के मुहं पर तमाचा मारा है, उसी तरह आने वाली पीढिय़ां हमे कभी माफ नहीं करेगी।
अभिव्यक्ति की रक्षा बनाम राजनीति
सबसे पहले उदय प्रकाश और उनके करीब एक माह बाद पूर्व प्रधानमंत्री की भांजी नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी। अब तो जैसे देश के कलमकारों में अपने अपने पुरस्कार लौटाने की हौड़ सी मची है और लगभग दो दर्जन से ज्यादा कलमजीवी अपने पुरस्कार लौटा चुके हैं। बिना किसी वैचारिक भेद और दुराव के। सभी का एक ही विरोध है कि देश में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही है। शासन मौन है। बेगुनाह मारे जा रहे हैं। कलमकारों की अभिव्यक्ति पर ताला लगाने की कोशिश हो रही है और विरोध करने वालों को मौत के घाट उतारा जा रहा है। चाहे कर्नाटक के ख्यातनाम लेखक कुलबर्गी हो या फिर महाराष्ट्र के गोविन्द पनसारे और नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या।
कलमकारों के विरोध का यह एक तरीका है। आखिर देश की संस्कृति और समाज पर आफत के दौर में कलमकार अपने शब्दों के जरिए प्रतिकात्मक विरोध ही तो जता सकता है और शुरुआत में जब प्रसिद्ध साहित्यकार उदयप्रकाश ने सितम्बर माह के पहले पखवाड़े में अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाकर कुलबर्गी की हत्या का विरोध किया तो इसे प्रतीकात्मक विरोध के रूप में ही लिया गया। वह था भी प्रतिकात्मक विरोध ही, लेकिन इसके बाद नयनतारा सहगल ने दादरी में गोमांस के संदेह में एक अधेड़ को घर से बाहर निकाल कर पीट पीट कर मार दिए जाने और सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे लोगों की चुप्पी पर आपत्ति जताते हुए अपना पुरस्कार लौटाया। अगले दिन अशोक वाजपेयी सुर्खियों में आए और अब जैसे जैसे पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों-साहित्यकारों की संख्या बढ़ती जा रही है, वैसे वैसे इन साहित्यकारों को समर्थन और विरोध में कई धड़े सामने आ रहे हैं। सबसे ज्यादा मौका उन लोगों को मिला है, जो सोशल मीडिया को अपनी भड़ास निकालने का साधन ही समझ बैठे हैं और जिन लोगों की वजह से सोशल मीडिया पर भक्त और ...ड़वे जैस जुमले नमुदार हो रहे हैं।
दरअसल, कलमकारों का विरोध अपनी जगह है और राजनेताओं की ओर से उनका विरोध अपनी जगह। यह प्रतिष्ठापित तथ्य है कि आज तक जब जब देश और समाज के सामने कोई संकट या आफत आई है, कलमकारों ने मे प्रतिकात्मक रूप से विरोध दर्ज करवाया है। आखिर कलमकार जमात राजनेता तो हो नहीं सकती जो धरना प्रदर्शन करे? फिर भी इस बात में कोई दो राय नहीं कि अब जैसे जैसे पुरस्कार लौटाने की हौड़ मची है, उसे देखकर मंतव्य पर सवाल उठना लाजिमी है।
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के अलावा कांग्रेस नेता और स्तम्भकार शशि थरूर भी पुरस्कार लौटाने वालों के विरोध में खड़े नजर आ रहे हैं। अपनी बेबाकी के कारण जाने जाने वाले अभिनेता अनुपम खैर तो खुलेतौर पर इसे प्रधानमंत्री की छवि खराब करने की कोशिशों का हिस्सा बता चुके हैं। हालांकि उनकी पत्नी भाजपा की सांसद है, फिर भी उनका बयान अनुपम को बेबाकी के लिए पहचानने वाले लोगों को नहीं पचा।
सवाल पुरस्कार लौटाने या नहीं लौटाने का नहीं है। सवाल धार्मिक असहिष्णुता बढऩे पर मौन और मुखर होने का भी नहीं है। सवाल इस बात पर उठ रहा है कि जिस तरह राजनीति की तरह सोशल मीडिया पर भी भक्त और नास्तिक जैसे दो धड़े बनते जा रहे हैं और लेखकों के पक्ष और विपक्ष में विष वमन किया जा रहा है, वह देश में सांस्कृतिक साम्प्रदायिकता फैलाने की कोशिश से कम नहीं है। लोग उदयप्रकाश, नयनतारा और अशोक वाजपेयी के पुरस्कार लौटाने को राजनीति से प्रेरित बताते हैं। एक मंच से सवाल उठा कि नयनतारा को 1986 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और इससे दो साल पहले दिल्ली में सिक्खों का कत्लेआम हुआ तो उन्होंने राजीव गांधी के प्रधानमंत्रीत्व काल में पुरस्कार ग्रहण क्यों किया? लेकिन यह सवाल उठाने वाले भूल जाते हैं कि 1975 में अपनी बहन इंदिरा गांधी के आपातकाल लगाने के फैसले का सबसे पहले विरोध भी नयनतारा ने ही किया था।
न्याय की तराजू के पलड़े बराबर होने चाहिए। विरोध करने वाले लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि आपातकाल लगाए जाने के विरोध में राजनेताओं के साथ पत्रकारों और साहित्यकारों ने भी अपने तरीके से विरोध दर्ज करवाया था। जेल में भी डाले गए थे। उस वक्त तो इनकी सराहना की गई। आज सराहना करने वाले लोग सत्ता में है तो विरोध। क्यों भाई? क्या विरोध करने वाले दादरी में इखलाल मियां को मार दिए जाने को सही मानते हैं? क्या कर्नाटका में कुलबर्गी की हत्या को जायज ठहराते हैं? क्या महाराष्ट्र में ढोंगियों का विरोध करने वाले पनसारे व दाभोलकर को अपराधियों द्वारा दी गई सजा-ए- मौत वाजिब थी? यदि नहीं तो इस पर चुप्पी पर सवाल उठाना कैसे गलत हो सकता है। देश में सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। सोशल मीडिया ने लेखकों-पत्रकारों के अलावा एक और नई जमात खड़ी की है, जिसका काम अपने आकाओं को खुश करने के लिए ऊलजुलूल बातें फैलाना ही रह गया है। इस चक्कर में सोशल मीडिया के जरिए अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करने वाले, खासकर सत्ता विरोधी टिप्पणी करने वाले और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग इस धड़े के निशाने पर हैं। पत्रकार रवीश कुमार से ज्यादा इस दर्द को शायद कोई समझ नहीं पाए। जिस तरह रवीश को सोशल साइट्स पर गरियाया गया। उनके नाम की फेक आईडी बनाकर कमेंट्स कर उन्हें कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई, उससे इस नए खतरे को समझा जा सकता है। एक धड़ा बहन गया है जो सत्ता विरोधी आवाज सुनना ही नहीं चाहता। अभिव्यक्ति की आजादी को आजादी रहने दीजिए, इसे राजनीति का अखाड़ा मत बनाइए। हमारे देश की पहचान अनेकता में एकता है। मत अनेक हो सकते हैं, देश को एक ही रहने दीजिए, वरना आज एक सत्रह साल के बच्चे ने जिस तरह कुलबर्गी हत्याकाण्ड के विरोध में अपना पुरस्कार लौटाकर समाज के मुहं पर तमाचा मारा है, उसी तरह आने वाली पीढिय़ां हमे कभी माफ नहीं करेगी।

Monday, October 5, 2015

स्वच्छता अभियान बनाम सफाईगीरी


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जंयती पर पिछले साल प्रधानमंत्री के आह्वान पर पूरे देश में स्वच्छता अभियान शुरू होने के बाद नेताओं-जनप्रतिनिधियों ही नहीं, अफसरों तक में झाड़ू लेकर फोटो खिंचवाने की हौड़ को हम साल भर बाद भी भूले नहीं है। किस तरह अभियान के नाम पर दिल्ली के कैम्पस में पहले कचरा फैलाने और बाद में इसे साफ करते हुए नेताओं-अफसरों की फोटो खिंचवाने की घटना पूरे देश में सुर्खियां बटोर गई थी। हालांकि नई बात नौ दिन, खींची तानी तेरह दिन वाली कहावत इस अभियान पर भी लागू हुई। कहना का मतलब है कि लाल किले की प्राचीर से पहली बार देशभर में सफाई का अभियान शुरू करने की प्रधानमंत्री की घोषणा और बापू की बर्थडे पर दो अक्टूबर से देश भर में अभियान का आगाज हुआ तो जैसे हौड़ सी मच गई थी सफाई करने की। रेलवे हो या फिर कोई छोटा मोटा सरकारी दफ्तर, सभी जगह झाड़ू लगाने की हौड़ सी दिखाई दी। अब इस बात पर सवाल उठाने का कोई मतलब ही नहीं रह गया था कि अभियान के नाम पर कहां कितनी झाड़ू और इसे लगाने वालों के माथे पर चढ़ी टोपियां खरीदी गई। खैर कुछ दिनों नहीं, महीनों तक अभियान चला। कहीं सैन्य छावनी में सफाई के लिए अधिकारी जवान जुटे हैं तो कहीं रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म को चमकाया जा रहा है। प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही नहीं, सोशल मीडिया तक सफाई अभियान छाया रहा। सैकड़ों-हजारों टन कचरा साफ करने के दावे हुए। कहीं कचरे के ढेर बरसों बाद साफ होने के दृश्य सामने लाए गए, लेकिन कुछ दिन बाद जोश ठण्डा सा पड़ गया। इस बार फिर गांधी जयंती पर इस जोश ने कुछ जोर लगाया। कुछ शिकवा-शिकायत हुए, कुछ दावे-प्रतिदावे। लेकिन ये तो जैसे नेताओं की रग रग में फैला रोग है कि कोई काम करे न करे, उनके सामने कैमरे के फ्लैश जरूर चमकने चाहिए। हालांकि हाल ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमरीका यात्रा के दौरान फोटो के लिए आगे आने की हौड़ का जिक्र समीचीन तो नहीं है, लेकिन यह इस रोग की ओर इशारा तो करता ही है।
बात चूंकि सफाईगीरी की हो रही है तो राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की एक तस्वीर ने भी इस गांधी जयंती पर  जनता जनार्दन का ध्यान खींच ही लिया। दरअसल, श्रीमती राजे सवाईमाधोपुर के दौरे पर थी। बकौल सरकारी प्रवक्ता बापू को श्रद्धासुमन अर्पित करने के बाद वे साफ-सफाई का निरीक्षण करने निकल पड़ी। विभिन्न इलाके देखने के बाद वे सरकारी अस्पताल पहुंची तो वहां एक स्थान पर गंदगी देखकर पौछा और पानी की बाल्टी मंगवाई और पौंछा लगाना शुरू कर दिया। अच्छी बात है। मुख्यमंत्री को पौंछा लगाते देख लोगों के मन में भी सफाई के प्रति जागरूकता आएगी और अस्पताल के कारिन्दे भी आइन्दा ध्यान रखेंगे। इस भावना के साथ उन्होंने पौंछा लगाया तो इसकी सराहना की जानी चाहिए, लेकिन जो तस्वीर अखबारों में साया हुई है, उसे देखकर उनका प्रयास सफाई अभियान की बजाय गांधी जंयती पर सफाईगीरी ज्यादा लगता है। (तस्वीर देखिए- इसमें बाल्टी और पौंछा एकदम नए हैं। पौंछा पकडऩे की स्टाइल से अन्दाजा लग ही जाएगा।)

स्वच्छता वाकई एक अहम मुद्दा रह्वही है। बापू ने हमेशा स्वच्छता पर जोर दिया और यदि उनको समर्पित करके कोई अभियान शुरू होता है और खुद प्रधानमंत्री इसकी शुरुआत करते हैं तो जाहिर के समाज में एक संदेश जाता है। नेताओं-अफसरों ने भले ही अभियान को खानापूर्ति, औपचारिकता या फोटो खिंचवाने का जरिया बऽा लिया, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आम लोगों में इस एक साल के दौरान सफाई के प्रति जागरुकता आई है। घरों में बच्चों तक इसका असर दिखता है। बच्चे कोई कचरा इधर-ऊधर फेंकने पर बड़ों को भी टोकने से नहीं कतराते। मुझे याद आता है बरसों पुराना एक किस्सा। सेना के अधिकारी मेरे मित्र गोवा गए थे। वहां उनके बच्चे ने टॉफी खरीदने की जिद्द की। उसे टॉॅफी खरीद कर दी गई। बच्चे ने रैपर सड़क पर फेंक दिया। इसी दौरान एक पुलिस कर्मी की उस पर नजर पड़ गई। वह बच्चे का पास आया और डांटने के अंदाज में बच्चे को आदेश दिया- पिक इट अप...। वह पुलिस कर्मी बच्चे का हाथ पकड़ कर डस्टबीन के पास ले गया और कहा, -ड्रॉप दिस हीयर। बच्चा मारे घबराहट के रो रहा था। पुलिस कर्मी ने इसके बाद बच्चे को दुलारा और पास ही स्थित एक कन्फ्

इस घटना को बीस साल से ज्यादा हो गए। बच्चा आज खुद सेना में है, लेकिन उस पुलिस कर्मी की नसीहत को नहीं भूला है।

हालांकि स्वच्छता अभियान और इस उदाहरण का कोई मेल नहीं भी हो, लेकिन यह घटना भी सफाई अभियान बनाम सफाईगीरी के फर्क को बताने के लिए उचित लगा। दरअसल, प्रधानमंत्री की स्वच्छता अपील ने घर घर असर किया, लेकिन नेताओं-अफसरों के फोटो सेशन ने इस अहम अभियान को सफाईगीरी बनाकर रख दिया। बेहतर होता, नेता भी  बिना प्रचार की भूख, इस अभियान में योगदान देते तो और ज्यादा लोग इससे प्रेरित होते। बहरहाल, ये हिन्दुस्तान की तासीर है। नेता प्रचार का मोह छोड़ नहीं सकते और जनता जो करती है, उससे उन्हें सही अर्थों में कोई सरोकार नहीं रहता।

क्शनरी शॉप पर ले जाकर उसे ढेर सारी टॉफियां दिलाई और वापस मां-बाप के पास छह्वोड़ते हुए बच्चे से कहा- यू आर द फ्यूचर ऑफ दिस कंट्री..डॉन्ट थ्रो एनी गार्बेज ऑन रोड। कीप क्लिनिंग द रोड्स इज अवर ड्यूटी।

Saturday, October 3, 2015

पोकरण को इसलिए प्यार करते थे कलाम

 विनम्र श्रद्धांजलि के बहाने याद पोकरण और कलाम की

 'रेत के धोरों में पूर्णिमा की रात मुझे अच्छी लगती है। मैं पूरे चांद वाली इस रात कुछ पल अकेले बिताना चाहता हूं...और मैं पोकरण को प्यार करता हूं क्योंकि यह कुछ करने और स्वच्छंदता का एक बेहतर मंच है।' पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने 2005  में जयपुर के करीब छह सौ स्कूली बच्चों के साथ संवाद के दौरान यह बात कही तो इसमें एक गहरा राज छिपा था। यह सभी जानते हैं कि 'जनता का राष्ट्रपति' (पीपुल्स प्रेजीडेंट) कलाम ने भारत को परमाणु ताकत के रूप में प्रतिष्ठापित करने में अहम भूमिका निभाई थी और दोनों की परमाणु परीक्षण पोकरण की धरती पर हुए थे, लेकिन पोकरण के प्रति कलाम का प्यार परमाणु अभियान से लगातार 24 वर्षों तक जुड़े रहने का नतीजा था। विनम्र श्र
देश के प्रमुख परमाणु वैज्ञानिक आर. चिदम्बरम के अलावा कलाम ही एक मात्र वैज्ञानिक थे, जिन्हें भारत के दोनों परमाणु परीक्षणों से जुड़े रहने का अवसर मिला और 1974 के बाद जब 1998 में 'बुद्ध फिर मुस्कराए' तो ये कलाम का ही कमाल था कि 1995 में भारत की परमाणु परीक्षण तैयारियों को पकड़ लेने वाले अमरीकी उपग्रहों तक को भनक नहीं लग सकी। कलाम ने जैसे ही प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को हॉटलाइन पर 'बुद्ध फिर मुस्कराए' का संदेश देकर लाइन काटी और इसकी आधिकारिक घोषणा हुई तो पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई।
ऑप शक्ति के अल्फा, ब्रावो, चार्ली....
कलाम ने ही परमाणु -दो की परिकल्पना को साकार किया था। हालांकि 1998 में हुए पांच परमाणु विस्फोटों की तैयारी कई बरसों से चल रही थी, लेकिन मई1998  के पहले 11 दिन जिस तरह से 'ऑपरेशन शक्ति' को अंजाम तक पहुंचाया गया, उसके कोड अल्फा, ब्रावो, चार्ली...आदि कलाम के अलावा किसी को पता नहीं थे। अल्फा भारतीय सेना की टुकड़ी, ब्रावो परमाणु ऊर्जा विभाग, चार्ली डीआरडीओ व डेल्टा भारतीय वायुसेना की टीमों को दिए गए साइन कोड थे।
सेव की पेटियां
ऑपरेशन शक्ति की शुरुआत सेव की पेटियां भारतीय वायुसेना के माल वाहक विमान एएन-32 में रखने के साथ हुई थी। एक मई को तड़के तीन बजे मुम्बई के सांताक्रुज हवाई अड्डे से जैसलमेर तक का हवाई सफर और जैसलमेर से पोकरण तक सेना के ट्रकों में सेव की पेटियों के साथ इस यात्रा की कमान मेजर जनरल नटराज (आर. चिदम्बरम) और 'मामाजी' (अनिल काकोडकर) के पास थी, लेकिन जैसे ही ट्रकों का कारवां सेव की पेटियां लेकर खेतोलाई गांव में बनाए गए 'डीयर पार्क' (परीक्षण नियंत्रण कक्ष) के प्रार्थना हॉल तक पहुंचा, कमान मेजर जनरल पृथ्वी राज (कलाम) के हाथ आ गई। दरअसल, लकड़ी के बक्सों में सेव नहीं, बल्कि भाभा ऑटोमिक रिसर्च सेंटर में बनाए गए परमाणु बम थे, जिन्हें बड़ी गोपनीयता के साथ मुम्बई से पोकरण लाया गया था।
व्हाइट हाउस में विस्फोट
परमाणु परीक्षण के लिए देह झुलसाने वाले गर्मी में महीनों से काम कर रहे कलाम ने सारा काम इस गोपनीयता से अंजाम दिया कि किसी को पता नहीं चल सका कि भारत इतना बड़ा धमाका करने वाला है। उन्होंने अल्फा कम्पनी की मदद से पांच गहरे कुए खुदवाए थे। इनके नाम भी अजीब थे। इनमें से दो सौ मीटर गहरे जिस कुएं में हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया गया, उसे व्हाइट हाउस का नाम दिया गया था, जबकि फिसन बम के कुए को ताजमहल और पहले सबकिलोटन बम वाले कुए को कुम्भकर्ण का नाम दिया गया। बाकी दो कुए एनटी-1 व एनटी-2 दूसरे दिन किए गए परीक्षणों के लिए आरक्षित रखे गए थे।
फौजी बनकर घूमते थे
पूरे अभियान के दौरान कलाम व अन्य वैज्ञानिक न सिर्फ फौजी नाम से रहे, बल्कि उन्होंने पूरे अभियान के दौरान फौज की वर्दी ही पहने रखी। पोकरण के बस स्टैण्ड पर कई बार ये वैज्ञानिक फौज की गाडिय़ों में घूमने आते थे, लेकिन इनकी हस्ती लोगों को भी तभी पता चली, जब दूसरे परमाणु परीक्षण की खबरें सामने आई।