Monday, October 9, 2017

Death or Dignity

सवाल सम्मान के साथ मौत का

-सुरेश व्यास

भारत के उच्चतम न्यायालय ने हाल ही एक याचिका पर केंद्र सरकार से फांसी की सजा का विकल्प ढूंढने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही दुनिया भर में मृत्युदंड के बर्बर तरीकों और मृत्यु दंड समाप्त किए जाने की बहस को नई गति मिल गई है। हालांकि भारत में मृत्यु दंड बिरले मामलों (रेयरेस्ट ऑफ द रेयर) में ही दिया जाता है, लेकिन याचिका में उठाया गया यह सवाल कि फांसी लगाकर मृत्यु दंड देना क्या भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं है, जो देश के प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने की आजादी प्रदान करता है, नई बहस शुरू कर चुका है।

प्रधान न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने सरकार से हालांकि इस सवाल पर जबाव मांगा है, लेकिन दो सवाल फिर भी कायम है कि मृत्यु दंड के लिए फांसी का विकल्प क्या हो, जिसमें फांसी की सजा वाले कैदी को बिना दर्द के मौत की नींद सुलाया जा सके और दूसरा यह कि क्या पूरी तरह ही समाप्त नहीं कर दिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के वकील और याचिकाकर्ता ऋषि मल्होत्रा का कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 21 न सिर्फ व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार प्रदान करता है, बल्कि मृत्यु दंड प्राप्त करने वाले कैदी की सम्मानजनक मौत का प्रावधान भी करता है, ताकि उसकी मृत्यु ज्यादा दर्दनाक न हो। सरकार क्या जवाब देती है और सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या व्यवस्था देता है, यह तो भविष्य बताएगा, लेकिन इस याचिका ने यह बहस जरूर छेड़ दी है कि सीआरपीसी की धारा 354 (5) में बदलाव होना चाहिए। इस धारा में मृत्युदंड की सजा पाए व्यक्ति को गर्दन में फंदा लगाकर सांस उखड़ने तक लटकाए जाने का प्रावधान किया गया है।

विधि आयोग हालांकि अपनी 35वीं और अक्टूबर 2013 में दी गई अपनी रिपोर्टों में फांसी की सजा और इसकी बर्बरता पर सवाल उठा चुका है। विधि आयोग की 187वीं रिपोर्ट में तो बाकायदा फांसी की सजा की बजाय लैथल इंजेक्शन के जरिए मृत्युदंड कारित करने की सिफारिश भी की गई है। अब चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फांसी के विकल्प सुझाने का निर्देश दिया है तो उम्मीद की जानी चाहिए की विधि आयोग की रिपोर्ट से भी सरकार धूल तो झाड़ेगी ही।

दर्दनाक है फांसी की सजा
देश में हालांकि फांसी की सजा बहुत ही विरले मामलों में देने का प्रावधान है, लेकिन फांसी पर लटकाए जाने की प्रक्रिया बड़ी दर्दनाक है। इसका असर न सिर्फ फांस पर चढ़ने वाले व्यक्ति पर नजर आता है, बल्कि सजा को लागू करने वाले अफसरों पर इसका मानसिक प्रभाव तो पड़ता ही है। मसलन जिसे फांसी पर चढ़ाया जाना है, पुलिस व जेल के अधिकारी इसकी तैयारी शुरू करते ही कैदी मानसिक दबाव में आ जाता है। उसका बाकायदा लम्बाई चौड़ाई का नाप लिया जाता है। वजन किया जाता है। उसके हिसाब से रस्सी की व्यवस्था होती है। फिर फांसी के निर्धारित समय से कई घंटे पहले तैयारी हो जाती है। आखिर में जब व्यक्ति को फंदे पर लटका दिया जाता है तो जब तक उसकी मृत्यु नहीं हो जाती वह फंदे पर लटका रहता है। उसकी आंखें तक बाहर आ जाती है। यह प्रक्रिया इतनी दर्दनाक है कि कई बार तो इसे लागू करवाने वाले अफसर कई दिनों तक सदमे से बाहर नहीं आ पाते। मुंम्बई पर आतंकी हमलों के गुनहगार अजमल कसाब को फांसी पर चढ़वाने वाली महिला आईपीएस अफसर ने सेवानिवृत्ति के बाद अपने इंटरव्यू में इस दर्द को बयां किया है।

उठती रही है फांसी खत्म करने की मांग
दुनिया भर में मानवाधिकार संगठन फांसी की सजा कॉ ही खत्म करने की मांग लम्बे अरसे से कर रहे हैं। इसका नतीजा है कि विश्व के लगभग 140 देशों में तो फांसी की सजा खत्म ही की जा चुकी है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अपनी रिपोर्ट में मृत्यु दंड की सजा को खत्म करने का सुझाव विभिन्न रिपोर्टों में दिया है। कई देश तो हालांकि मृत्युदंड के मानवीय तरीकों पर काम भी कर रहे हैं, लेकिन दुनिया जब अरब देशों में आज भी मृत्युदंड के बर्बर तरीकों को देखती है तो सहम उठती है।

व्यावहारिक रहा है अदालतों का नजरिया
भारत की न्याय व्यवस्था ने समय समय पर संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कई अहम फैसले किए हैं। इनमें सबसे बड़ा फैसला भारतीय दंड संहिता की धारा 303 को खत्म करने का है। मिट्ठू बनाम भारत संघ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को खत्म किया था। इसमें प्रावधान था कि यदि कोई उम्रकैद की सजा काट रहा है और इस दौरान उसने कोई जंघन्य अपराध कर दिया तो उसे फांसी की सजा ही होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को ही असंवैधानिक करार दे दिया। इसी तरह मृत्युदंड के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट का नजरिया मानवीय ही रहा है। बच्चन सिंह बनाम पंजाब के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फांसी की सजा बिरले (रेयरेस्ट ऑफ द रेयर) मामले में ही दी जानी चाहिए।

भारत में फांसी कम ही
सुप्रीम कोर्ट के फांसी की सजा बिरले मामलों में ही देने के निर्देशों का ही असर है कि देश में पिछले तीन दशकों में बहुत कम लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई है और फांसी की सजा लागू करने के भी गिनती के मामले ही सामने आए हैं। देश में सम्भवतः आखिरी बार फांसी की सजा जुलाई 2015 मुंबई बम धमाकों के आरोपी याकूब मेनन को हुई थी। इससे पहले फरवरी 2013 में अफजल गुरू व नवम्बर 2012 में मुंबई में आतंकी हमले के गुनहगार अजमल कसाब को फांसी पर लटाया गया था। कसाब से पहले 2004 में धनंजय चटर्जी को फांसी पर लटकाया गया था। जहां तक फांसी से मृत्युदंड का सवाल है दुनिया में आज भी इरान और अन्य अरब देशों में यह प्रथा ज्यादा प्रचलन में है। इरान में तो एक साल में औसतन तीन सौ से ज्यादा लोगों को फांसी पर चढ़ा दिया जाता है।

इंजेक्शन है बेहकर विकल्प
अब सवाल है कि फांसी तो मृत्यु दंड का बेहतर विकल्प क्या हो। इसके लिए विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जिस लैथल इंजेक्शन का सुझाव दिया है, वह तरीका दुनिया के कई देशों में अपनाया भी जा रहा है। इसके तहत व्यक्ति को बेहोश करने वाली दवा की हाई डोड इंजेक्शन के जरिए लगाई जाती है और आदमी धीरे धीरे मौत के आदेश में समा जाता है। अमरीका के ऑकहामा स्टेट में 1977 में सबसे पहले मृत्यु दंड का यह तरीका अपनाया गया था, जिसे कई अन्य़ देशों ने भी बाद में मान्यता दी है।


#SupremeCourtofIndia #CapitalPunishment #Hanging #Law

Sunday, October 8, 2017

...तो क्या वाकई वायुसेना तैयार है दो मोर्चों पर लड़ने के लिए


-सुरेश व्यास

दुनिया की पांच सर्वश्रेष्ठ वायुसेनाओं में शुमार भारतीय वायुसेना 8 अक्टूबर 2017 को 85 साल
की हो गई। पहले रॉयल एयरफोर्स और अब इंडियन एयरफोर्स। मौका पड़ने पर हर कसौटी
पर खरी उतरने वाली वायुसेना के बुलंद हौंसलों पर कोई संदेह नहीं है और न ही वायुसैनिकों
की कर्तव्य परायणता पर कोई अंगुली उठा सकता है। इस बार वायुसेना दिवस के मौके
सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस और बाद में हिंडन में आयोजित वायुसेना दिवस समारोह के दौरान
वायुसेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ के दो बयान, जिनमें उन्होंने वायुसेना की
क्षमताओं को उजागर किया है, चर्चा में बने हुए हैं। एयर मार्शल धनोआ का पहला बयान,
जिसमें उन्होंने कहा कि भारतीय वायुसेना दो मोर्चों पर लड़ने में पूरी तरह सक्षम है। साथ ही
आदेश मिला तो पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों को भी नैस्तनाबूद करने की पूरी तैयारी है।
उनका दूसरा बयान हिंडन में आया, जिसमें उन्होंने कहा कि वायुसेना किसी शॉर्ट नोटिस पर
भी लड़ने को तैयार है।
वायुसेनाध्यक्ष एयर मार्शल धनोआ के ये बयान निश्चित रूप से नभ प्रहरियों के उच्च मनोबल और सामरिक ताकत को इंगित करते हैं, लेकिन जिस तरह वायुसेना के पास लगातार लड़ाकू
विमानों का टोटा होता जा रहा है, उसके मद्देनजर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या वाकई
वायुसेना इस हालात में भी दो मोर्चों (चीन और पाकिस्तान) पर लड़ने की स्थिति में है? वह भी
उस स्थिति में जब 85 साल पुरानी वायुसेना के पास आज भी स्वदेशी लड़ाकू विमानों की एक
भी स्क्वाड्रन खड़ी नहीं हो पाई है। वायुसेना के सामने सत्तर के दशक से मजबूती का पर्याय बने रहे मिग विमानों की विदाई और उनकी जगह नए विमान आने में हो रही देरी भी एक बड़ी चुनौती है।

कम हो रही हैं स्क्वाड्रन की संख्या
वायुसेना के पास आज की तारीख में लड़ाकू विमानों की 42 स्क्वाड्रन (प्रत्येक स्क्वाड्रन में 16
से 18 विमान) होनी चाहिए, लेकिन वायुसेना अभी मात्र 33 स्क्वाड्रन से ही काम चला रही है।
यह पिछले एक दशक में वायुसेना की लड़ाकू विमान स्क्वाड्रन का सबसे न्यूनतम स्तर है।
पिछले दशक तक वायुसेना के पास 39.5 स्क्वाड्रन हुआ करती थी, लेकिन विमानों की
दुर्घटनाओं व पुराने विमानों की विदाई के चलते स्क्वाड्रन की संख्या लगातार कम हो रही है।

अगले दो-तीन साल चुनौतीपूर्ण
रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो वायुसेना के सामरिक इतिहास में सत्तर के दशक से अहम भूमिका
अदा करते आ रहे रूस निर्मित लड़ाकू विमान मिग-21 की करीब 11 स्क्वाड्रन आने वाले दो
तीन साल में धीरे धीरे विदा होती जाएगी। यानी करीब 220 विमान वायुसेना के बेड़े से कम
होने वाले हैं, लेकिन इनकी भरपाई का काम बहुत ही धीमी गति से चल रहा है। ऐसे में जब
मिग-21 विमान फेज आउट हो जाएंगे तो वायुसेना की चुनौती और बढ़ती चली जाएगी।

जगुआर व मिग-29 भी होंगे विदा
वायुसेना से अगले पांच वर्ष के दौरान डबल इंजन वाले जगुआर और मिग-29 विमान भी विदा
होने हैं। इनकी लगभग 8 स्क्वाड्रन विदा हो जाएगी। इनकी भरपाई पर भी खरीद नीति में
निरंतर किए जा रहे बदलावों और मैक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत अन्तरराष्ट्रीय विमान
निर्माता कम्पनियों से समझौते की धीमी गति चिंता का सबब बनी हुई है।

तेजस का इंतजार
वायुसेना के लिए स्वदेश में विकसित और हिन्दुस्तान एयरोनोटिकल्स लिमिटेड (एचएएल) में
बन रहे हल्के लड़ाकू विमान (एलसीए) तेजस का भी इंतजार ही बना हुआ है। एचएएल ने वर्ष
2005 में वायुसेना से वादा किया था कि वह वर्ष 2018 तक एलसीए तेजस मार्क-1 के 40
विमान उपलब्ध करवा देगी, लेकिन उत्पादन की गति काफी धीमी है। ऐसे में संशय बना हुआ
है कि क्या वाकई निर्धारित अवधि तक 40 तेजस विमान वायुसेना के बेड़े में शामिल हो
पाएंगे। यहां उल्लेखनीय है कि वायुसेना ने एचएएल से 123 तेजस विमान खरीदने का करार
किया है। इसकी शुरुआती स्क्वाड्रन बेंगलुरू में स्थापित करने की प्रक्रिया भी चल रही है।

लम्बा हुआ राफैल का इंतजार
वायुसेना की लम्बे समय से चली आ रही मल्टीरोल मीडियम रैंज कॉम्बेट एयरक्राफ्ट
(एमएमआरसीए) की मांग हालांकि पिछली यूपीए सरकार के वक्त में सिरे चढ़ने लगी थी,
लेकिन देश में सत्ता परिवर्तन के साथ इसकी गति पर भी जैसे ब्रेक लग गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी के नेतृत्व वाली नई सरकार ने एमएमआरसीए के तहत फ्रांस से 126 राफैल लड़ाकू
विमान खरीदने के सौदे को बदल कर 36 विमान खरीदने का नए सिरे से करार किया।
हालांकि फ्रांस की डेसाल्ट कम्पनी में इसी महीने भारतीय वायुसेना के लिए राफैल विमान
बनाने के लिए स्टील शीट कटिंग की रस्म अदायगी हो चुकी है यानी निर्माण शुरू हो चुका है।
फिर भी करार के अनुसार राफैल की पहली खेप वर्ष 2020 तक आने के बारे में अभी कुछ
नहीं कहा जा सकता।

मैक इन इंडिया का फंडा
अब सवाल यह है कि वायुसेना के लिए जरूर लड़ाकू विमानों की व्यवस्था कैसे होगी? मोदी
सरकार ने मैक इन इंडिया प्रोग्राम के तहत दुनिया की दो बड़ी कम्पनियों के साथ करार
करने की दिशा में कदम बढ़ाया है ताकि इन विमानों का निर्माण भारत में ही शुरू किया जा
सके। इसके लिए रक्षा मंत्रालय एफ-16 फाल्कन लड़ाकू विमान बनाने वाली अमरीकी
कम्पनी लॉकहिड मार्टिन व ग्रीपन लड़ाकू विमान बनाने वाली स्वीडन की कम्पनी साब को
रिक्वेस्ट फॉर इन्फोर्मेशन (आरएफआई) भेज रहा है। वायुसेनाध्यक्ष एयर मार्शल धनोआ ने
हिंडन में कहा कि इसी महीने आरएफआई दोनों कंपनियों को भेज दी जाएगी। इसकी
सहमति आते ही दोनों कंपनियां भारत में निर्माण करने के लिए स्थानीय कंपनियों से करार
करेगी। लॉकहिड मार्टिन ने टाटा और साब ने अडानी समूह के साथ मिलकर लड़ाकू विमान
निर्माण के कारखाने लगाने पर सहमति जता दी है। लेकिन कब सहमति आएगी, कब करार
होंगे और कब काम शुरू होगा, इस बारे में स्थिति अभी तक साफ नहीं है।

सारा भार सुखोई पर
रूस में बने मल्टी रोल लड़ाकू विमान सुखोई-30 एमकेआई अभी भारतीय वायुसेना की रीढ़
की हड्डी हैं। लगभग 250 सुखोई विमानों के बेड़े ने वायुसेना को मजबूती दी है, इसमें कोई
संशय नहीं है। पश्चिम की रेगिस्तानी और मैदानी सीमा से लेकर उत्तर-पूर्व की पहाड़ी सीमाओं
पर सुखोई की मौजूदगी देश के लोगों को आकाशीय सुरक्षा के मामले में आशान्वित करने के
लिए काफी है, लेकिन जब तक नए विमान नहीं आएंगे, लगता है वायुसेना को मजबूत हौंसले
के दम पर ही सामरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

#IndianAirForce #MiG-21 #Raffle #MakeinIndia #IAFday

Friday, October 6, 2017

सवाल 'मुर्गे की गर्दन' का है बाबा


लगभग सवा महीने की शांति के बाद डोकलाम एक बार फिर चर्चा में आ रहा है। पहले तो वायुसेना दिवल की वार्षिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय वायुसेना के मुखिया एयरचीफ मार्शल बीएस धनोआ का वह बयान, जिसमें उन्होंने डोकलाम के निकट चंबी वैली में चीनी सैनिकों की मौजूदगी पर सवाल उठाया था और दूसरा, चीन का डोकलाम में मौजूदा सड़क को चौड़ा करने का काम शुरू करना। इन दोनों पहलुओं से डोकलाम विवाद को फिर हवा मिलने की आशंका खड़ी हो रही है।
 
चीन ने हालांकि सड़क का काम जहां शुरू किया है, वह जगह उस विवादित स्थल से लगभग 12 किलोमीटर दूर है, जहां भारत और चीन की सेनाएं गत 16 जून को पहली बार आमने-सामने हुई थी और इसके बाद दोनों देशों के बीच लगभग 73 दिन तक विवाद बना रहा था। फिर भी जानकार मानते हैं कि चीन की यह ताजा कोशिश एक बार फिर डोकलाम इलाके में दोनों देशों की सेनाओं की मौजूदगी बढ़ने का संकेत दे रही है। हालांकि डोकलाम विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के दौरान दोनों देशों की सेनाएं विवादित क्षेत्र से हटने पर सहमत हो चुकी हैं।

दरअसल, डोकलाम में मौजूदगी भारत और चीन के लिए सामरिक लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। चीन की कोशिश है कि भूटान के उस भूभाग, जिसे वह अपने डोंगलांग प्रांत का हिस्सा मानना है, उसे सड़क से पूरी तरह कनेक्ट कर दिया जाए, ताकि उसे भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में सीधा एक्सेस मिल सके। यह इलाका भारत के लिए भी सामरिक नजरिए से उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि चीन के लिए। डोकलाम भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर से जुड़ा है, जो देश के सातों उत्तर-पूर्वी राज्यों को जोड़ता है। इस इलाके की नक्शे पर मौजूद भौगोलिक स्थिति इसे चिकन नैक यानी मुर्गे की गर्दन का नाम देती है। भारत की चिंता यह है कि डोकलाम भले ही उसकी बजाय भूटान का भूभाग है, लेकिन इस रास्ते चीन पहुंच गया तो यह भारत के लिए मुर्दे की गर्दन मरोड़ने जैसा ही होगा। कारण कि डोकलाम में सड़क बन जाने का सीधा सा मतलब है चीन को भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों तक सीधा रास्ता सुलभ हो जाना।

भारत, चीन और भूटान के बीच ट्राइ जंक्शन कहलाने वाले डोकलाम में चीन को रोकने के लिए भारत के पास भूटान के साथ किया गया वर्ष 2007 का वह समझौता है, जिसमें भारत भूटान को उसके हितों की रक्षा का वादा करता है। चूंकि भूटान और चीन के बीच राजनयिक सम्बन्ध नहीं है, ऐसे में डोकलाम के मामले में भारत और चीन ही आमने सामने होते रहे हैं।


भारत-चीन सम्बन्धों की जानकारी रखने वाले लोगों का कहना है कि चीन के लिए आगामी नवम्बर में प्रस्तावित चीनी कांग्रेस का सम्मेलन वहां की राजनीति के लिहाज से अहम है। ऐसे में चीन ब्रिक्स सम्मेलन से दूर रहने की भारत की चेतावनी के बाद भले ही अगस्त के आखिरी सप्ताह में डोकलाम से हटने पर राजी हो गया हो, लेकिन चीन की कोशिश रहेगी कि वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस तक इस मुद्दे को जिंदा रखे। ऐसे में आने वाले दिनों में ‘सॉफ्ट टार्गेट’ बना डोकलाम का मुद्दा थोड़े थोड़े अंतराल पर छाया रह सकता है।

#Indo-Chinadispute #IndiaChinarelations #Doklam #Chikenneck

भारत-चीन सीमा पर अभी बहुत कुछ करने की जरूरत


भारत और चीन के बीच जून से अगस्त तक डोकलाम विवाद को लेकर चली तनातनी के बीच दोनों देशों के बीच चली शाब्दिक तल्खी में चीन ने भारत को नतीजे भुगतने की जब धमकी दी तो भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने यह बयान दिया था कि भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है। उन्होंने साफ संकेत दिया था कि भारत-चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध के बाद स्थतियां काफी बदल चुकी है और भारत आज की तारीख में सामरिक दृष्टिमाना कि हम पहले से मजबूत हैं
भारत और चीन के बीच जून से अगस्त तक डोकलाम विवाद को लेकर चली तनातनी के बीच दोनों देशों के बीच चली शाब्दिक तल्खी में चीन ने भारत को नतीजे भुगतने की जब धमकी दी तो भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने यह बयान दिया था कि भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है। उन्होंने साफ संकेत दिया था कि भारत-चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध के बाद स्थतियां काफी बदल चुकी है और भारत आज की तारीख में सामरिक दृष्टि से उतना कमजोर नहीं है, जितना चीन उसे समझ रहा है।

कई मायनों में देखा जाए तो जेटली का यह बयान सही भी है। आज भारत ने आर्थिक और औद्योगिक विकास के साथ सामरिक दृष्टि से भी तकनीकी रूप से काफी तरक्की की है और वह धीरे धीरे दुनिया की मजबूत सामरिक ताकतों में शुमार किया जाने लगा है। फिर भी सवाल उठ रहा है कि चीन के परिप्रेक्ष्य में क्या हम उतना मजबूत हैं, जितना हमें होना चाहिए? यह सवाल हमेशा से रक्षा विशेषज्ञों के बीच में चर्चा का विषय भी रहा है।  

आज के हालात में भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की नजर से देखें तो अकसाई चीन और अरुणाचल प्रदेश को लेकर दोनों देशों के बीच लम्बे अरसे से विवाद चला आ रहा है। दोनों देशों से सटी अन्तरराष्ट्रीय सीमा की भौगोलिक स्थितयां इस विवाद में अहम कड़ी हैं। जिन भौगोलिक परिस्थितयों में भारत को चीन से मुकाबले के लिए खुद को तैयार करना था, उस दिशा में क्या तेजी से काम हुआ है,यह लाख टके का सवाल है। हालांकि भारत ने चीन की सीमा तक अपने संसाधन बढ़ाए हैं। अरुणाचल प्रदेश से असम तक और लेह लद्दाख से सटी सीमा तक काफी कुछ आधारभूत संरचनाएं विकसित की गई है, लेकिन इनकी धीमी गति हमेशा से चिंता का विषय बनी हुई है। मसलन भारत-चीन सीमा से सटे इलाकों में भारत को वर्ष 2012 तक 73 सड़कों का विकास करना था, लेकिन आंकड़ा 21 तक ही पहुंच पाया और अब इस काम को करने की समय सीमा भी वर्ष 2019-20 तक बढ़ाई जा चुकी है। इसी तरह पहाड़ी व दुर्गम इलाकों में ऑपरेशनल तैयारियों को बेहतर ढंग से अमलीजामा पहनाने के लिए गठित की गई भारतीय थल सेना की माउंटेन स्ट्राइक कोर की गति भी उतनी तेज नहीं है, जितना तेज उसे होना चाहिए था। कोर आज भी समग्र संसाधनों से लैस नहीं हो पाई है। लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि भारत चीन के मुकाबले खुद को कमजोर पाता है। अरुणाचल प्रदेश और असम के अग्रिम इलाकों में हवाई पट्टियों का विकास और आज की तारीख में वायुसेना की रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले सुखोई-30 विमानों की स्क्वाड्रनों की भारत-चीन सीमा पर मौजूदगी भारत की सामरिक तैयारियों में मजबूती को आश्वस्त करती है। इसके अलावा इसी साल शुरू हुए ढोला-सदिया ब्रिज, जिले असम के प्रमुख लोक गायक भूपेन हजारिका के नाम पर समर्पित किया गया है, ने भी पूर्वोत्तर राज्यों में सीमा तक सेना की पहुंच को सुगम बनाने का काम किया है। ऐसे में जानकार कहते हैं कि भारत ने धीरे धीरे ही सही, चीन को साधने की सामरिक तैयारी को योजनाबद्ध रूप से पूरा करने का प्रयास किया है, लेकिन अभी इस दिशा में बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। से उतना कमजोर नहीं है, जितना चीन उसे समझ रहा है। 

कई मायनों में देखा जाए तो जेटली का यह बयान सही भी है। आज भारत ने आर्थिक और औद्योगिक विकास के साथ सामरिक दृष्टि से भी तकनीकी रूप से काफी तरक्की की है और वह धीरे धीरे दुनिया की मजबूत सामरिक ताकतों में शुमार किया जाने लगा है। फिर भी सवाल उठ रहा है कि चीन के परिप्रेक्ष्य में क्या हम उतना मजबूत हैं, जितना हमें होना चाहिए? यह सवाल हमेशा से रक्षा विशेषज्ञों के बीच में चर्चा का विषय भी रहा है।

आज के हालात में भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की नजर से देखें तो अकसाई चीन और अरुणाचल प्रदेश को लेकर दोनों देशों के बीच लम्बे अरसे से विवाद चला आ रहा है। दोनों देशों से सटी अन्तरराष्ट्रीय सीमा की भौगोलिक स्थितयां इस विवाद में अहम कड़ी हैं। जिन भौगोलिक परिस्थितयों में भारत को चीन से मुकाबले के लिए खुद को तैयार करना था, उस दिशा में क्या तेजी से काम हुआ है,यह लाख टके का सवाल है। हालांकि भारत ने चीन की सीमा तक अपने संसाधन बढ़ाए हैं। अरुणाचल प्रदेश से असम तक और लेह लद्दाख से सटी सीमा तक काफी कुछ आधारभूत संरचनाएं विकसित की गई है, लेकिन इनकी धीमी गति हमेशा से चिंता का विषय बनी हुई है। मसलन भारत-चीन सीमा से सटे इलाकों में भारत को वर्ष 2012 तक 73 सड़कों का विकास करना था, लेकिन आंकड़ा 21 तक ही पहुंच पाया और अब इस काम को करने की समय सीमा भी वर्ष 2019-20 तक बढ़ाई जा चुकी है। इसी तरह पहाड़ी व दुर्गम इलाकों में ऑपरेशनल तैयारियों को बेहतर ढंग से अमलीजामा पहनाने के लिए गठित की गई भारतीय थल सेना की माउंटेन स्ट्राइक कोर की गति भी उतनी तेज नहीं है, जितना तेज उसे होना चाहिए था। कोर आज भी समग्र संसाधनों से लैस नहीं हो पाई है। लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि भारत चीन के मुकाबले खुद को कमजोर पाता है। अरुणाचल प्रदेश और असम के अग्रिम इलाकों में हवाई पट्टियों का विकास और आज की तारीख में वायुसेना की रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले सुखोई-30 विमानों की स्क्वाड्रनों की भारत-चीन सीमा पर मौजूदगी भारत की सामरिक तैयारियों में मजबूती को आश्वस्त करती है। इसके अलावा इसी साल शुरू हुए ढोला-सदिया ब्रिज, जिले असम के प्रमुख लोक गायक भूपेन हजारिका के नाम पर समर्पित किया गया है, ने भी पूर्वोत्तर राज्यों में सीमा तक सेना की पहुंच को सुगम बनाने का काम किया है। ऐसे में जानकार कहते हैं कि भारत ने धीरे धीरे ही सही, चीन को साधने की सामरिक तैयारी को योजनाबद्ध रूप से पूरा करने का प्रयास किया है, लेकिन अभी इस दिशा में बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।
#Indo-Chinadispute #IndiaChinarelations #Doklam #Chikenneck

Thursday, October 5, 2017

जब खालिस्तान के निशाने पर आया राजस्थान

दूधिए ने पकड़वाए आतंकी

लगभग 23 साल बाद राजस्थान का संगीन अपहरण कांड गुरुवार को पूरी दुनिया में एक बार सुर्खियों में आ गया। यह है राजेंद्र मिर्धा अपहरण कांड और इस मामले में जयपुर की एक स्थानीय अदालत ने खालिस्तान लिब्रेशन फोर्स के एक आतंकी को दोषी करार दिया है। आतंकी पंजाब के लुधियाना में भटारी गांव के मूल निवासी हरनेक सिंह को अदालत कल सजा सुनाएगी। इस मामले में एक दम्पती दयासिंह लाहोरिया व उसकी पत्नी सुमन सूद को अदालत लगभग 13 साल पहले ही सजा सुना चुकी है।
इस मामले ,का रोचक पहलू ये है कि पुलिस एक दुधिए की मदद से आतंकियों तक पहुंची थी। दूधिए की सूचना के आधार पर न सिर्फ अपहृत राजेंद्र मिर्धा को मुक्त करवाया गया, बल्कि पुलिस और आतंकियों की मुठभेड़ में खालिस्तान लिब्रेशन फोर्स का एक दुर्दांत आतंकी नवनीतसिंह कादिया मारा गया और दो अन्य मौके से फरार हो गए। खासियत की बात यह है कि कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे और देश के पहले सबसे चर्चित आर्थिक घोटाले हर्षद मेहता कांड की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति के मुखिया रामनिवास मिर्धा के पुत्र राजेंद्र का पंजाब के दुर्दांत आतंकी देवेंद्रसिंह भुल्लर की रिहाई की मांग पर अपहरण करने वाले आतंकियों का सुराग देने वाले दूधिए को पुलिस को वैसी ही सुरक्षा प्रदान करनी पड़ी, जैसी आतंकी खतरे की स्थिति में आज के राजनेताओं को प्रदान की जाती है।
दरअसल, व्यवसायी और पिता की राजनीतिक छवि से कोसों दूर राजेंद्र का पंजाब के आतंकियों ने 17 फरवरी 1995 को उस वक्त अपहरण कर लिया था, जब वे मोर्निग वॉक के लिए अपने घर से निकले। सफेद मारूति कार में आए तीन आतंकियों ने हथियार के बल पर राजेंद्र मिर्धा को उठाया और जयपुर के ही मोडल टाऊन, मा्लवीय नगर में बंधक बनाकर लगभग नौ दिन तक रखा। इन लोगों ने अपहरण के लगभग एक डेढ़ घंटे बाद ही राजेंद्र की पत्नी उदयरानी मिर्धा को फोन करके कहा कि राजेंद्र उनके कब्जे में हैं। वे उन्हें दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर 18-19 जनवरी को पकड़े गए देवेंद्र सिंह भुल्लर की रिहाई तक नहीं छोड़ेंगे। आतंकियों ने मामले की जानकारी पुलिस को देने या फोन को टेप करवाने की स्थिति में राजेंद्र को शारीरिक क्षति पहुंचाने की धमकी भी दी। उदयरानी ने अपने देवर और राजस्थान सरकार में मंत्री रहे हरेंद्र मिर्धा को अपहरण के बारे में जानकारी दी। उन्होंने जयपुर के अशोक नगर थाने में मामला दर्ज करवा दिया, लेकिन पुलिस के हाथ खाली ही रहे। इसी दौरान मालवीय नगर इलाके के मोडल टाउन में दूध की सप्लाई करने वाले हनुमान बागड़ा को मकान संख्या बी-117 में रहने वाले लोगों के बारे में संदेह हुआ। इन लोगों ने कुछ दिन पहले ही प्रोपर्टी डीलर्स के जरिए यह मकान एक स्था्नीय निवासी से खरीदा था और रजिस्ट्री के लिए दिल्ली के अलग अलग बैंकों से 45-45 हजार के तीन डिमांड ड्राफ्ट बनवाए थे। पुलिस ने इस मकान पर नजर रखी और जब भी पुलिस वहां जाती तो वहां रहने वाली महिला कहती कि उसका बेटा बीमार है, इसलिए वे लोग बाहर नहीं निकलते। दूधिए की सूचना पुलिस को सही लगी और आखिर पुलिस ने दल बल के साथ इस मकान पर 25 फरवरी को दबिश दी तो आतंकियों ने गोलाबारी शुरू कर दी। इस दौरान पुलिस की गोली से एक कुख्यात खालिस्तानी आतंकी कादिया मारा गया और दो अन्य भाग निकले। पुलिस ने राजेंद्र को सकुशल मुक्त करवा लिया। फरार हुए आतंकी दयासिंह लोहारिया और उसकी पत्नी सुमन की तलाश शुरू हुई, लेकिन वे दोनों अमरीका भाग गए। वहां से अवैध रूप से कनाडा भागने की कोशिश कर रहे दम्पती को अमरीकी पुलिस ने मिनोसोटा हवाई अड्डे पर 3 अगस्त 1995 को दबोच लिया। लम्बी कानूनी प्रक्रिया के बाद अमरीकी अदालत के आदेश पर दोनों को प्रत्यापित किया गया। लेकिन मौके से भाग निकला आतंकी हरनेक सिंह पुलिस की गिरफ्त से दूर था। इस दौरान लाहोरिया दम्पती पर जयपुर की अदालत में मामला शुरू हुआ। पहले इन पर टाडा की धाराएं लगाई गई और अजमेर में स्थित विशेष टाडा कोर्ट में सुनवाई होती रही, लेकिन उनके वकीलों ने कहा कि प्रत्यर्पण की शर्तों के हिसाब से टाडा मे मामला नहीं चलाया जा सकता तो मामला फिर जयपुर की अदालत को भेजा गया। अदालत ने लम्बी सुनवाई के बाद 20 अक्टूबर 2004 को दोनों को दोषी माना। दयासिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई गई। सुमन सूद को सात साल की जेल हुई। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील की तो सुमन को भी उम्र कैद की सजा सुनाई गई, लेकिन मौके से भाग निकला हरनेकसिंह पुलिस की पकड़ से दूर था। उसे पंजाब पुलिस ने 2004 मे गिरफ्तार किया। उसे  फरवरी 2007 को राजस्थान लाकर मिर्धा अपहरण मामले में मुकदमा चलाया गया, तब से हरनेक जेल में है। राजस्थान उच्च न्यायालय के निर्देश पर जयपुर की अपर जिला न्यायाधीश संख्या 3 की अदालत ने लगातार सुनवाई की और 23 सितम्बर को सुनवाई पूरी होने के बाद गुरुवार को हरनेक को दोषी करार दिया गया। उसे शुक्रवार को सजा सुनाई जाएगी।

दुधिए के साथ चलते थे गनमैन

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि राजेंद्र मिर्धा का अपहरण करने के बाद आतंकियों ने उसकी पत्नी को फोन किया, लेकिन उनका सुराग लगाना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में दूधिए हनुमान बागड़ा की सूचना ने सारे मामले की तह में जाने की राह प्रशस्त की। चूंकि 1995 में इस घटना ने पंजाब में आतंकवाद के फिर खड़ा होने का खतरा पैदा कर दिया था, ऐसे में बागड़ा को तब तक पुलिस ने सुरक्षा प्रदान की, जब तक मामला मंजिल तक नहीं पहुंचा। दूधिए के साथ हर वक्त पुलिस के गनमैन साये की तरह चलते थे।

परिवार नहीं करना चाहता बात

दूधिए का परिवार आज भी जयपुर के जगतपुरा इलाके में रहता है, लेकिन घटना के बाद परिवार को मिली धमकियों से उनका परिवार आज भी इतना आतंकित है कि इस मामले पर कोई बात नहीं करना चाहता। इसके अलावा करीब तीन साल पहले बागड़ा पर हुए ऐसिड अटैक ने भी परिवार के हौंसले पस्त कर रखे हैं। हालांकि अब बागड़ा को पुलिस सुरक्षा नहीं है,लेकिन कल आने वाले फैसले के मद्देनजर परिवार में खुशी भी है तो भय भी है।

मिर्धा का हो चुका निधन

जयपुर के् पोश इलाके सी स्कीम में आजाद मार्ग पर रहने वाले राजेंद्र मिर्धा का वर्ष 2009 में हार्ट अटैक से निधन हो गया था। उनके पिता रामनिवास मिर्धा का निधन भी हो चुका है, लेकिन अपहरण का मामला दर्ज करवाने वाले उनके भाई हरेंद्र मिर्धा आज भी राजस्थान की कांग्रेस राजनीति में सक्रिय हैं। वे 1998 में बनी अशोक गहलोत सरकार में काबिना मंत्री रह चुके हैं। आज मारवाड़ की कांग्रेस राजनीति के पर्याय रहे नागौर जिले में अहम कड़ी बने हुए हैं।

Wednesday, May 18, 2016

राफेल पर रार और तेजस की दरकार


 --सुरेश व्यास
स्वदेश निर्मित पहले हल्के लड़ाकू विमान तेजस को जो वायुसेना आज तक कभी ओवरवेट (भारी), अंडर पॉवर (कमजोर) और ओबसोलेट (बेकार) और यहां तक कि तीन टांग वाला चीता कहती रही और उसकी लगातार अनदेखी के कारण न सिर्फ तीन दशक तक यह परियोजना पूरी नहीं हो सकी, उसी वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल अरूप राहा के मुंह से तेजस की तारीफ चौंकाने वाली है। रेंग-रेंग कर पूरी होने की ओर बढ़ रही तेजस परियोजना के तहत पहला स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान वर्ष 2001 में सामने आया। फिर भी अब तक वायुसेना में अपना मुकाम नहीं बना पाया। पहली उड़ान के लगभग 15 साल बाद कोई तेजस उड़ाने वाले राहा पहले वायुसेनाध्यक्ष हैं। राहा ने न सिर्फ तेजस उड़ाया, बल्कि आधे घंटे की उड़ान की मारक क्षमता को परखा। इसके बाद उनका यह कहना कि यह वायुसेना की जरूरतों के हिसाब से एक बेहतरीन विमान है, विमान निर्माता सरकारी कम्पनी हिन्दुस्तान एयरोनोटिकल्स लिमिटेड के लिए जरूर सुखदायी है। फिर भी सवाल उठ रहा है कि तेजस की अब तक 3050 परीक्षण उड़ानों के बाद आखिर वायुसेना का हृदय परिवर्तन अब क्यों हुआ?
क्या यह प्रधानमंत्री मोदी के 'मेक इन इंडियाÓ कार्यक्रम का नतीजा है? क्या हाल ही बहरीन में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय एयर शो में तेजस के अद्भुत प्रदर्शन की बदौलत वायुसेना की राय बदली है? या फिर क्या बुढिय़ाए जा रहे मिग श्रेणी के विमानों के कारण लगातार घट रही वायुसेना की लड़ाकू विमान स्क्वाड्रन और राफेल सौदे में हो रही देरी ने वायुसेना को इसके लिए मजबूर किया है?
कहने को तो तेजस परियोजना को आई तेजी को मेक इन इंडिया से जोड़ा जा सकता है, लेकिन जब हमारे सामने मोदी का फ्रांस के राष्ट्रपति होलांद के साथ गत जनवरी में 26 राफेल भारी कीमत में खरीदने का करार हो तो, इसे मानने का मन नहीं करता। वह भी उस तथ्य की रोशनी में कि जिस फ्रांस से पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने वर्ष 2007 में 126 राफेल करीब 48 हजार करोड़ रुपए में खरीदने की मंजूरी दी थी, उसी राफेल निर्माता कम्पनी डासॉल्ट से हम मात्र 36 राफेल विमान 65 हजार करोड़ रुपए में खरीदने के लिए राजी हो रहे हैं।
रुपए का अवमूल्यन और उत्पादन लागत बढऩे के तर्क अपनी जगह पर हो सकते हैं, लेकिन क्या फ्रांस से सौदे की आधी राशि भारत में निवेश के वादे के साथ महंगे राफेल खरीदना क्या उस देश के लिए उचित हैं, जहां बुंदेलखण्ड में लोग घास की रोटी खाने के लिए मजबूर हो या कोई आदमी जेब में रोटी का टुकड़ा लिए भूख से मर जाए और महाराष्ट्र सरीखे राज्य में घनी आबादी पानी की बूंद के लिए तरस जाए।
घास की रोटी बनाम राफेल
इन परिस्थितियों में जब राफेल की अत्यधिक कीमत पर सवाल के जवाब में रक्षा राज्यमंत्री राव इंद्रजीत सिंह यह कह दें कि जब देश की सीमाएं सुरक्षित होगी और जब हमारा आसमां सुरक्षित होगा, तभी देश विकास कर सकता है। यदि आपके पास सुरक्षा नहीं होगी तो घास की रोटी भी नहीं मिलेगी, तो आसानी से समझा जा सकता है कि सरकार किस मजबूरी मे फंसी है।
फिर भी असल सवाल तो वायुसेना का है, जिसकी वजह से तेजस परियोजना अटकती-भटकती रही है। आगामी एक जुलाई को चार विमानों के साथ वायुसेना में तेजस की पहली स्क्वाड्रान बेंगलूरु स्थित एचएएल परिसर में स्थापित होनी हैै। ऐसे में वायुसेनाध्यक्ष के मुंह से तारीफ का सीधा सा मतलब है कि वायुसेना अब ज्यादा इंतजार करने की स्थिति में नहीं है।
हालांकि राफेल जैसे मीडियम मल्टीरोल कॉम्बेट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसी) दुश्मन के इलाके में अंदर तक जाकर मार करने के लिए वायुसेना की महती जरूरत है, लेकिन जैसे जैसे उसके पास लड़ाकू विमानों की कमी होती जा रही है और कुल स्कवाड्रन की संख्या 42 से घटकर 33 से 35 के बीच रह गई है तो तेजस उसकी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने की मजबूरी भी हो सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि तेजस वायुसेना की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, लेकिन मिग श्रेणी के विमानों के बाद सुखोई-30 एमकेआई, मिराज और जगुआर जैसे विमानों के बीच की खाई पूरी करने के लिए तेजस न सिर्फ एक बेहतर नभचर साबित हो सकता है, बल्कि एयर टू ग्राउंड हमलों के लिए सहज उपलब्ध एकमात्र बेहतरीन विकल्प भी है।
तेजस की उपयोगिता यूं भी बढ़ जाती है कि उसके अपग्रेडेड संस्करण भी परीक्षण में खरे उतर चुके हैं। वायुसेना ने अब तक तेजस में कुल 53 तरह की खामियां गिनाई थी और मिड एयर रिफ्यूलिंग जैसी सुविधा से भी इसे लैस कर दिया गया है तो वायुसेना के पास कहने को कुछ बचता नहीं है।
दरअसल, भारत सरकार और भारतीय वायुसेना 'घर का जोगी जोगणा, आण गांव का सिद्धÓ की तर्ज पर शुरू से तेजस की अनदेखी करते रहे हैं। सरकार ने जहां तेजस परियोजना के वित्त पोषण में हाथ खींचे रखे, वहीं वायुसेना के अधिकारी लगातार इसमें मीनमेख (खामियां) निकालते रहे। नतीजन विमान की री-डिजाइन करनी पड़ी और इससे लागत, समय, पैसा और इसके इंडक्शन में देरी हुई सो अलग।
तत्काल जरूरत भी है कारण
भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों का बेड़ा बढ़ाने की अहम जरूरत है। हालत यह है कि मिग-21 की विदाई के बाद भारत तो उस जैसे ही किसी विमान की तत्काल जरूरत है। नए विमान खरीदने के बारे में फैसला लेेने में लगातार देरी चिंता का सबब बनी हुई है।
एक की कीमत में छह तेजस
राफेल की अत्यधिक कीमत और सौदे की शर्तों में सत्ता परिवर्तन के साथ हुए बदलाव से भी विमान हासिल होने में देरी लाजिमी है। ऐसे में तेजस पर वायुसेना का भरोसा लौटा तो ताज्जुब नहीं है। वर्ष 2007 में फ्रांस से राफेल विमान खरीदने का फैसला हुआ और कुल 126 राफेल के लिए अनुमानित कीमत 10 से 12 बिलियन डॉलर यानी करीब 48 हजार करोड़ आंकी गई। इसके बाद से लगातार कीमत बढ़ती जा रही है। सरकार फैसला नहीं कर पा रही कि राफेल कितने और किस कीमत पर खरीदे जाएं?
पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान फ्रांस से 126 की बजाय सिर्फ 36 राफेल 65 हजार करोड़ रुपए में खरीदने का सौदा किया गया, लेकिन प्रत्येक राफेल की कीमत लगभग 1750 करोड़ रुपए पड़ रही है। कीमत इतनी ज्यादा कि इसकी कीमत में वर्तमान में भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता की रीढ़ की हड्डी बने सुखोई-30 एमकेआई जैसे दो या छह तेजस विमान खरीदे जा सकते हैं।
अभी यह पता नहीं है कि निगोसिएशन के बाद जब तक सौदा पटेगा, तब तक राफेल की कीमत कहां तक पहुंच जाएगी। फ्रांस की कम्पनी डासॉल्ट साल में अधिकतम 14 राफैल बनाकर दे सकती है, इस हिसाब से आज भी यदि राफेल की पहली खेप भारत को मिल जाए तो सभी 126 विमान तो वर्ष 2030 तक भी वायुसेना को प्राप्त नहीं हो पाएंगे।

Monday, May 16, 2016

पाकिस्तान के हालात और भारत की सामरिक चिंता

सामरिक मजबूती बनाम राजनीतिक नेतृत्व की इच्छाशक्ति
-सुरेश व्यास
कहते हैं कि  होश खो देने या पागलपन के कारण ही कोई झगड़ा फसाद होता है। घर-समाज और गलियों चौबारों के झगड़े भी आवेश के कारण होते हैं और निपट जाते हैं, लेकिन आज जो हालात पड़ोसी देशों में बन रहे हैं और जिस तरह से इन देशों में कूटनीतिक रास्तों से किसी ताकतवर देश का पिच्छलग्गू बनने या बनाने की की कोशिशें चल रही है, उसे देखते हुए भारत की सामरिक चिंता को कम नहीं आंका जाना चाहिए।

भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को खासकर इस नजरिए से देखा जाए और उसकी अमरीका को पटाए रखने के साथ चीन के साथ पिछले करीब एक दशक से चल रही गलबहियां और हाल ही भारत-पाक सीमा के निकट चीन की गतिविधियां वाकई चिंता पैदा करती है। चीन के साथ भारत का सीमा विवाद तो है ही, लेकिन जिस तरह पाकिस्तान ने कश्मीर के बहाने आतंक को पाल-पोस कर भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया है, वह भी भारत के लिए दुश्मन नम्बर वन ही बना हुआ है।

भारत की सरकारें पाकिस्तान के साथ हमेशा सौहाद्र्रपूर्ण सम्बन्धों की कोशिशें करती रही है, लेकिन इसके नतीजे क्या रहे, इसे आतंकी गतिविधियों को झेलने वाले लोगों के साथ देश की बाकी जनता से ज्यादा शायद हमारे हुक्मरान भी नहीं समझ पाए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर यात्रा से दोस्ती के संदेश के बाद जिस तरह कारगिल का युद्ध हुआ। मौजूदा प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी की गोपनीय व देश-दुनिया को चौंकाने वाली लाहौर यात्रा के बाद पठानकोट पर आतंकी हमला हुआ। ऐसे और भी कई उदाहरण मिल जाएंगे। आतंक से निपटने की बात अलग है और सामरिक दृष्टि से पाकिस्तान के प्रति सजग रहने की बात एकदम अलग है।

भारत की मौजूदा चिंता पाकिस्तान से पोषित आतंकवाद से निपटने के अलावा, पाकिस्तान की चीन के साथ बढ़ती नजदीकियां तो हैं ही, लेकिन जिस तरह चीन नेपाल सरीखे भारत के विश्वस्त पड़ोसी को भी झांसे में लेने की कोशिश कर रहा है, उससे लगता है कि अमरीका के बहाने चीन भारत को चौतरफा घेरने की कोशिश में पाकिस्तान के कंधे पर बंदूक रखने की चेष्टा में है। गरीब, कुचला-दबा पाकिस्तान पैसे के लिए अपना जमीर गिरवी रखने के लिए कुख्यात रहा है। अफगानिस्तान से रूसी सेना की विदाई के बाद भले ही तालिबान को सह देने की बात हो या अमरीका पर हुए सबसे बड़े 9/11 आतंकी हमले के दोषी ओसामा बिन लादेन को अपने यहां छिपाए रखने का दृष्टांत हो, पाकिस्तान ने पैसे के लिए कुछ भी करेगा वाली कहावत को चरितार्थ करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी।

अब चीन के साथ उसकी नजदीकियां और चीन की ओर से भारत से सटी सीमा पर अपनी सामरिका गतिविधियां बढ़ाए जाने का वाशिंगटन से हुए रहस्योद्घाटन भारत के लोगों के लिए चिंता का सबब है।

सवाल है कि क्या चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत पर हमला करने की तैयारी में है? संयुक्त राष्ट्र संघ के कायदों से बंधा चीन शायद खुद तो हमलावर नहीं होगा, लेकिन पाकिस्तान को उकसाने की उसकी सम्भावित नीति भी घातक सिद्ध हो सकती है।

इस चिंता से हमारे हुक्मरान कितना वाकिफ है, कह नहीं सकते, लेकिन भारतीय रक्षा सेनाओं में तो इसे लेकर खासी चिंता है और इससे निपटने की इनकी तैयारी भी नजर आती है। हाल ही अप्रेल माह में  भारतीय फौज ने एक बड़ा युद्धाभ्यास किया शत्रुजीत। इसका मकसद वैसे तो भारतीय फौज को भविष्य में होने वाले आणविक, जैविक और रासायनिक युद्ध से निपटने के लिए तैयार करना था, लेकिन असली चिंता थी पाकिस्तान का पागलपन। सवाल था कि पाकिस्तान ने खुदा न खास्ता कोई पागलपन  करके भारत की ओर परमाणु हथियार दाग दिए तो क्या होगा और इससे कैसे निपटा जाएगा?

पाकिस्तान का पागलपन भारतीय फौज को एकाएक नजर नहीं आया। दरअसल पाकिस्तान ने पिछले दिनों साठ किलोमीटर तक मार करने वाली नस्र (हत्फ-९) जैसी कम दूरी की मिसाइयों से परमाणु हमले की क्षमता हासिल की है। इसके अलावा सब किलोटन क्षमता के छोटी दूरी पर मार करने वाले अन्य परमाणु हथियार भी बनाए हैं। इन 'टेक्टिकल न्यूक्लियर वैपन (टीएनडब्ल्यू) को हाल ही अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी खतरनाक बताया था। पाकिस्तान वैसे तो दुनिया के सामने कहता रहा है कि वह परमाणु हमले की पहल नहीं करेगा, लेकिन जिस तरह पाकिस्तान में आतंकी संगठन मजबूत होते जा रहे हैं, उससे एक खतरा पाकिस्तानी परमाणु हथियार आतंकियों के हाथ में पडऩे का भी है। यह भी भारत की चिंता का सबब है। साथ ही हाल ही पाकिस्तान के हमलावर (ऑफेंसिव) युद्ध सिद्धांत और उसके लगातार टीएनडब्ल्यू की ओर केंद्रीत होने का खुलासा भी हुआ है। इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान अब भारत की ओर से हमला किए जाने का इंतजार नहीं करेगा। उसकी कोशिश होगी कि मौका पड़ते ही छोटा-मोटा हमला कर भारत के भूभाग पर कब्जा किया जाए, ताकि युद्धोपरांत इसे निगोशिएशन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके।


पाकिस्तान की हालत क्या है, यह किसी से छिपी हुई नहीं है। खुद वह आतंकी गतिविधियों का सामना कर रहा है। आए दिन वहां भी आतंकी निर्दोष लोगों का खून बहा रहे हैं। पाकिस्तान की आतंरिक स्थिति भी ठीक नहीं कही जा सकती। सिंध, पंजाब और बलूचिस्तान जैसे इलाकों में  कानून व्यवस्था नाम की चीज दिखाई नहीं देती। सिंध और पंजाब की प्रतिस्पर्धा और बलूचिस्तान में पख्तूनों की जंग, पाकिस्तान के आंतरिक रूप से अस्थिर होने का संकेत दे रही है। कहने को तो वहां निर्वाचित सरकार है, लेकिन दबदबा आज भी फौज का है। ऐसे में पाकिस्तान के आतंरिक हालात, विकट आर्थिक स्थिति, फौज का कट्टरपन और कूटनीतिक मोर्चे पर  'मुंह में राम बगल में छुरी वाली उसकी स्थिति भारत के लिए वाकई खतरा है।

पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति और नवगठित सामरिक नीतियों को समझने की कोशिश करते हुए भारतीय थल सेना ने युद्धाभ्यास 'शत्रुजीत में सेना की नवोदित आर्मर्ड, आर्टीलरी व इंफे्रंट्री इकाइयों ने न्यूक्लियर, बायोलोजिकल व केमिकल (एनबीसी) युद्ध के काल्पनिक माहौल में खुद को तैयार करने के लिए पसीना बहाया है। इस दौरान कम दूरी की मिसाइलों का भी प्राथमिकता से इस्तेमाल किया गया। सेनाओं के सामंजस्य को परखने और परमाणु युद्ध की स्थिति में सेना की ओर से बचाव व जवाब तथा थर्ड डाइमेंशन (हवाई मार्ग) से फौजी टुकडिय़ों को युद्ध के मैदान में उतारने की तैयारी को भी परखा गया। मथुरा स्थित सेना की पहली स्ट्राइक कोर की अगुवाई में 'ऑपरेशन शत्रुजीत नामक युद्धाभ्यास में कोर के ४० से ५० हजार जवान न्यूक्लियर, बायोलोजिकल व केमिकल (एनबीसी) हमले के काल्पनिक माहौल में परमाणु हथियारों का मुकाबला करने और दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए करीब डेढ़ माह तक पसीना बहाकर लौटे हैं।

जाहिर है, एक तरफ चीन का पाकिस्तान के नजदीक जाना, उसे आर्थिक व सामरिक मदद प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रदान करना और दूसरी ओर पाकिस्तान का वार डॉकट्रेन बदलने के साथ टीएनटी पर जोर देना, भारतीय फौज के लिए चुनौती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान को किसी भी ऐसी हरकत पर मुंहतोड़ जवाब देने में भारतीय सेना सक्षम है, लेकिन देश के राजनीतिक नेतृत्व को भी इन खतरों को भांप कर खुद को तैयार रखना होगा। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में भारतीय फौज की तैयारी का हश्र क्या होता है, यह देश वर्ष 2001 में भारतीय संसद पर आतंकी हमले के बाद 11 महीने तक चले ऑपरेशन पराक्रम में देख चुका है।

इस हकीकत को नकारा नहीं जा सकता कि पाकिस्तान के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, ऐसे में वह कोई भी पागलपन कर भी सकता है। सवाल है कि क्या हम उसके पागलपन का समय पर और सख्त जवाब दे पाएंगे या सेना का 'ऑपरेशन शत्रुजीत जैसा प्रयास कमजोर राजनीतिक इच्छा शक्ति के आगे बौना साबित हो जाएगा?