Wednesday, May 1, 2019

प्रेस की आजादी बनाम हेट कैम्पेन

-सुरेश व्यास
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर जारी सूचकांक ने भारत में पत्रकारिता के समक्ष नए खतरों की ओर इशारा किया है...असहमति की जगह ले रहे हेट कैम्पेन ने अभिव्यक्ति की आजादी के सामने एक नई चुनौती खड़ी की है....



वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की रैंकिंग में भारत इस बार भी दो पायदान पिछड़ा है...दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में मीडिया की आजादी की रैंकिंग लगातार गिरी है और इस बार भारत की रैंकिंग लुढ़क कर 140वें पायदान तक पहुंच गई है...यानी देश के पत्रकारों के लिए स्थितियां ठीक नहीं है...असहमति अब हेट कैम्पेन सरीखी असहिष्णुता के रूप में तब्दील होती दिख रही है...एक तबका ऐसा भी खड़ा हुआ है जो आलोचना को पचाना तो दूर सहन तक नहीं कर पा रहा...सत्ता के मद में अभिव्यक्ति को दबाने की कोशिश भी सामने आई है...फिर भी देश में राजस्थान पत्रिका जैसे मीडिया समूह आज भी निष्पक्षता के दम पर ऐसे किसी कुत्सित प्रयास का मुकाबला करने के लिए अडिग दिखाई देते हैं...

फिर भी चौथा स्तम्भ
विश्व पत्रकारिता दिवस 3 मई को दुनिया भर में मनाया जाता है...संयुक्त राष्ट्र महासभा में साल 1991 में पारित प्रस्ताव के बाद हर साल 3 मई को मनाया जाने वाला यह दिन भारत के लिए भी खास है...खास इस मायने में भी है कि देश के संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी वाले प्रावधानों के संदर्भ में प्रेस भले ही कहीं नहीं दिखता, लेकिन हमारे यहां मीडिया को विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका के बाद संविधान के चौथे स्तम्भ के रूप में देखा जाता रहा है...फिर भी देश में मीडिया इंडस्ट्री के विकास के साथ साथ देश के पत्रकारों के सामने खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं...हर साल आने वाले वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की रैंकिंग में भारत लगातार पिछड़ता जा रहा है...इसका आशय यह कत्तई नहीं है कि हमारे यहां मीडिया की ताकत कम हुई है...राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों में भ्रष्टों को कानून के जरिए दुष्कर्म पीड़िता जैसी इम्युनिटी प्रदान करने वाली प्रचंड बहुमत की सरकारों को झुकना भी पड़ा है...



खतरनाक है मर्जी के खिलाफ बोलना
वैश्विक स्तर पर पत्रकारों की सुरक्षा और संरक्षा को लेकर काम करने वाले संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने हाल ही वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स-2019 जारी किया है...इसमें नार्वे जैसा छोटा देश प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में अव्वल बना हुआ है तो भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की रैंकिंग लगातार गिरती जा रही है.. इस बार 180 देशों के वैश्विक रैंकिंग  इंडेक्स में भारत को 140 वें स्थान पर रखा गया है...जबकि पिछले बार रैंकिंग में हम 138वें पायदान पर थे...यह इस बात का संकेत है कि देश में पत्रकारों के लिए स्थितियां ठीक नहीं है... रिपोर्ट इशारा कर रही है कि एक बड़े तबके की मर्जी के खिलाफ बोलना यहां के पत्रकारों के लिए खतरनाक हो सकता है...पत्रकार संगठित रूप से हेट कैंपेन का शिकार हो रहे हैं...पत्रकारों के खिलाफ हिंसा में आतंकी व नक्सली हमले ही नहीं, पुलिस के साथ भ्रष्ट राजनेताओं व माफिया की ओर से होने वाले हमले भी शामिल हैं...



छोटे देश भी ज्यादा सुरक्षित 
देश में पिछले साल काम के दौरान हिंसा की घटनाओं में 6 पत्रकार मारे गए...इनमें गैर अंग्रेजी मीडिया संगठनों में काम करने वाले पत्रकार ज्यादा हैं...दुनिया भर में पत्रकारों पर हमले का रिकार्ड रखने वाले पेरिस स्थित एनजीओ रिपोर्टर्स सैन फ्रंटियर्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत के मुकाबले नार्वे, फिनलैंड, नीदरलैंड, इथोपिया व जांबिया जैसे देशों में भी पत्रकार ज्यादा सुरक्षित हैं...

दस सालों से बढ़ रहा खतरा
विश्व प्रेस सूचकांक में भारत की रैंकिंग लगातार गिर रही है... साल 2010 में भारत रैंकिंग में 122वें स्थान पर था...इसके बाद 2014 तक 140वें स्थान पर रहा... आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि किस साल भारत की क्या थी प्रेस की स्वंत्रता के मामले में रैंकिंग और कैसे आती रही इसमें गिरावट...
रैंकिंग भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की
वर्ष---रैंकिंग
2019---140
2018---138
2017---136
2016---133
2015---136
2014--- 140

खत्म हो रही सहनशक्ति
आंकड़े बता रहे हैं कि भारत में पत्रकारों के लिए चुनौतियां बढ़ती जा रही है...खासतौर पर उन पत्रकारों के लिए जो सत्ता का सच उजागर करने का जज्बा दिखाते हैं...सच्चाई सहन न कर पाने की प्रवृत्ति का असर पत्रकारिता को चुनौती के रूप में सामने आया है...लेकिन भारत में मीडिया निष्पक्षता के दम पर अब भी हेट कैम्पेन का निडरता से सामना कर रहा है..उस दौर में जब सरकारें मीडिया घरानों पर प्रभुत्व बढ़ाने की कोशिशों में लगी है...ऐसे में क्या उम्मीद करें कि प्रेस की आजादी की रैंकिंग में सुधार के कोई सरकारी प्रयास सामने आएंगे...करेंगे अगले साल के आंकड़ों का इंतजार हिम्मत और जज्बा दिखाते हुए...जय-जय...



Sunday, March 18, 2018

राजस्थान में वसुंधरा मंत्रिमंडल के फेरबदल पर क्यों भयभीत है भाजपा

मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाओं के बीच भाजपा आलाकमान को कोई अदृश्य भय सता रहा हैं कि हाल के उपचुनाव में मिली करारी हार के बाद डेमेज कंट्रोल का यह कदम कहीं भारी न पड़ जाए-

-सुरेश व्यास
जयपुर। राजस्थान में वसुंधरा राजे मंत्रिमंडल के विस्तार की चर्चा तो पिछले करीब एक सप्ताह से चल रही है, लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया है। न विस्तार पर कोई  निर्णय हुआ है और न ही राज्य के संगठन में किसी फेरबदल को अंतिम रूप मिला है। इसमें देरी के पीछे किसी न किसी अदृश्य भय को कारण माना जा रहा है। सम्भवतः भाजपा आलाकमान इस बात को लेकर पेशोपेश में है कि हाल के उपचुनाव नतीजों में मिली हार के  बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल के जरिए डेमेज कंट्रोल का कदम कहीं भारी तो नहीं पड़ जाएगा।

विधानसभा चुनाव से ठीक दस महीने पहले दो संसदीय व एक विधानसभा चुनाव में हार का सदमा झेल रही भाजपा डेमैज कंट्रोल में तो लगी है, लेकिन  बातें अभी सिरे नहीं चढ़ पा रही। उपचुनाव  के नतीजों ने भाजपा को एंटी इन्कमबेंसी का संदेश तो दिया भी है, लेकिन कार्यकर्ताओं की नाराजगी के कारण अंदरूनी हालात भी
ठीक नहीं है। मंत्री  व भाजपा के कुछ नेता ब्यूरोक्रेसी के निरंकुश होने की बात कर रहे हैं तो कार्यकर्ताओं का कहना है कि मंत्री उन्हें भाव ही नहीं दे रहे।  ऐसे में पिछले कुछ दिनों से नौकरशाही के साथ राज्य मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चाएं जोरों पर हैं। लेकिन लगता है कि मंत्रिमंडल फेरबदल को लेकर भी भाजपा नेतृत्व को कोई अदृश्य भय सता रहा है।

जातिगत समीकरणों का प्लस-माइनस
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि प्रदेश में आगामी नवम्बर-दिसम्बर में  विधानसभा चुनाव होने है, इससे पहले मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मंत्रिमंडल में फेरबदल एक रिस्क फैक्टर भी है। इसलिए ही शायद भाजपा नेतृत्व कोई फैसला नहीं कर पा रहा। प्रस्तावित मंत्रिमंडल फेरबदल में कुछ मंत्रियों-विधायकों का कद बढ़ाकर जातिगत समीकरण साधना एक बड़ा मकसद हो सकता है, लेकिन जिनका कद घटाया जाना है, उनकी संभावित
नाराजगी ने इस चुनावी साल में भाजपा आलाकमान को असमंजस में डाल रखा है। मसलन, दो उप मुख्यमंत्री बनाने की बात हो रही है। ये विशुद्ध रूप से जातिगत आधार पर तय होना है। इसमें बात सामने आ रही है कि एक ब्राह्मण व एक राजपूत नेता को उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। कुछ नाम सामने भी आए हैं, लेकिन इनके प्लस-माइनस ने मामला उलझा रखा है।
संघम् शरणं गच्छामि...
मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चाओं के बीच इन दिनों भारती भवन की ओर भी नेताओं-कार्यकर्ताओं की आवाजाही बढ़ी हुई नजर आ रही है। कारण साफ है कि बिना आरएसएस की मदद के भाजपा की चुनावी वैतरणी पार लगनी मुश्किल है। पिछले चार साल के दौरान आरएसएस के मौजूदा सरकार व प्रदेश संगठन से सम्बन्ध किसी से छिपे हुए नहीं है। मैट्रो रेल परियोजना के लिए मंदिरों की शिफ्टिंग के मुद्दे पर तो संघ के आह्वान पर जयपुर बंद तक हुआ है। संघ की ओर से भाजपा प्रदेश संगठन में संगठन महामंत्री पद पर नियुक्ति में देरी ने भी इन संबंधों को जाहिर ही किया था। प्रेक्षकों की राय में राज्य सरकार पर कथित तौर पर संघ की अनदेखी के आरोप भी लगे, लेकिन इस चुनावी साल में भाजपा संघ की नाराजगी या तटस्थ रुख की रिस्क लेने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में भाजपा नेता 'संघम् शरणं गच्छामी' दिखाई दे रहे हैं। मंत्रिमंडल फेरबदल में संघ की राय अहम रहेगी। इससे ही भाजपा कुछ डेमेज कंट्रोल करने की स्थिति में आ सकेगी।
भय का फ्री हैंड फैक्टर
मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल वैसे तो मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार होता है। अब तक मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने हिसाब से ही फेरबदल करने में कामयाब रही है। यहां तक कि प्रदेशाध्यक्ष की नियुक्ति में भी उनकी मर्जी ही चली है, लेकिन अब सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या इस बार भी वसुंधरा को ऐसा ही फ्री हैंड मिल सकेगा। यदि ऐसा होता है तो भाजपा आलाकमान को वांछित फायदा मिलने में शंका नजर आ रही है और नहीं होता है तब भी दिक्कत कम नहीं होगी। ऐसे में माना जा रहा है कि 'फ्री हैंड' भी फेरबदल में देरी का एक प्रमुख कारण है।

Saturday, February 3, 2018

अमरीका ने देखा तेजस का तेज

सुरेश व्यास-
भारत में बने सुपरसोनिक लड़ाकू विमान तेजस ने शनिवार को इतिहास रच डाला। दुनिया की सबसे ताकतवर अमरीकी वायुसेना के मुखिया जनरल डेविड गोल्डफिन ने तेजस उड़ाया तो वे इसके तेज में डूबते-उतरते नजर आए। गोल्डफिन ने जोधपुर एयरबेस से तेजस उड़ाया।
                                    
 वे पाकिस्तान की सीमा तक जाकर वापस लौटे। करीब पौन घंटे की ये उड़ान वायुसेना में मिग विमानों की जगह लेने जा रहे तेजस के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में जुड़ गई। 
चकित रह गए गोल्डफिन
सुबह की गुलाबी ठंड...धरती पर सीधी किरणें फेंककर सूर्यनगरी के नाम को सार्थकता प्रदान करते सूर्यदेव के साथ रिश्तों की गर्मजोशी। ये नजारा था पाकिस्तान को कई बार नाकों चने चबवा चुके पश्चिमी सरहद के शक्तिशाली जोधपुर एयर बेस का। 

दुनिया की ताकतवर वायुसेनाओं में शुमार अमरीकी वायुसेना के मुखिया गोल्डफिन ने फ्लाइट गियर पहनकर जोधपुर एयर बेस से स्वदेश निर्मित लड़ाकू विमान तेजस में उड़ान भरी तो इस लड़ाकू विमान की खूबियां देखकर चकित रह गए। 


गोपनीय रहा कार्यक्रमभारत यात्रा पर आए गोल्डफिन वायुसेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ के साथ बातचीत में वे तेजस से इतना प्रभावित हुए कि उड़ान भरने का कार्यक्रम बन गया। वे अचानक शुक्रवार की रात जोधपुर पहुंचे, लेकिन उनकी यह यात्रा उड़ान तक गोपनीय ही बनी रही।


मिरेकल मशीनअमरीका के खाड़ी युद्ध से लेकर अफगानिस्तान तक एयर ऑपरेशंस का नेतृत्व करने वाले गोल्डफिन की यह उड़ान तेजस के लिए काफी अहम साबित हुई। 

4200 घंटे तक लड़ाकू विमान उड़ाने का अनुभव रखने वाले गोल्डफिन तेजस की खूबियों से बेहद प्रभावित नजर आए। उन्होंने जब इसे मिरेकल मशीन...वैरी स्मूद कहा तो तेजस स्क्वाड्रन के वायुयोद्धाओं के सीने गर्व से फूल गए।


प्रोजेक्ट को मिली परवाजपिछले साल ही भारतीय वायुसेना में शामिल हुए तेजस की स्क्वाड्रन अभी शैशवकाल में है, लेकिन पिछले दिसम्बर में वायुसेना को 83 तेजस विमान खरीदने की मंजूरी मिलने के बाद तीन दशक पुराने प्रोजेक्ट तेजस को परवाज मिली है।


 अब जब अमरीकी वायुसेना प्रमुख ने इसकी खासियतों का अनुभव किया है अब तक गुमनामी में खोये रहे तेजस को नई बुलंदियां मिलने का रास्ता भी खुल गया है।

हर किसी ने की तारीफभारतीय वायुसेना भले ही इस मैक इन इंडिया फाइटर जेट से दूरी बनाती रही हो, लेकिन जिसने भी तेजस को उड़ाया, वो इसकी तारीफ किए बिना नहीं रह सका। पिछले साल नवम्बर में सिंगापुर के रक्षा मंत्री ने भी कलाइकुंडा एयरबेस से तेजस की उड़ान के बाद इसे सर्वश्रेष्ठ बताया था। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अमरीकी वायुसेना प्रमुख की तारीफ तेजस को नई बुलंदियां देगी।

Thursday, February 1, 2018

खतरा बढ़ा, रक्षा बजट नहीं


-सुरेश व्यास
देश की उत्तरी व पश्चिमी सीमा पर लगातार खतरा बढ़ने के बावजूद रक्षा बजट में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं होना अचम्भे की बात है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक फरवरी को लोकसभा में मोदी सरकार का आखिरी पूर्णकालीक बजट पेश करते हुए रक्षा बजट में 2.95 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। आंकड़े के रूप में यह पिछले बजट अनुमान से करीब 7.81 प्रतिशत ज्यादा बताया गया है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की नजर से यह सम्भवतः पिछले छह दशक में अब तक का सबसे कम रक्षा बजट है।

कुछ दिन पहले ही रिटायर्ड मेजर जनरल भुवनचंद्र खंडूरी की अध्यक्षता वाली रक्षा मामलों की संसदीय समिति ने रक्षा बजट की नाकाफी पर हैरानी जताई थी। साथ ही सैन्य संस्थानों के संसाधनों की कमी पर ध्यान नहीं दिए जाने को भी प्रमुखता से रेखांकित किया था, लेकिन बजट में जैसे संसदीय समिति की बात को एकतरह से नजर अंदाज ही कर दिया गया। संसदीय समिति ने रक्षा बजट देश की जीडीपी के 3 प्रतिशत के बराबर करने की सिफारिश की थी। जबकि मोदी सरकार में पिछले चार साल से जीडीपी के आधार पर आंकलन में रक्षा बजट लगातार कम होता जा रहा है। इस बार का रक्षा बजट जीडीपी का मात्र 1.57 प्रतिशत है, जिसे 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद का सबसे कम रक्षा बजट बताया जा रहा है।

जरूरत का आधा भी नहीं
साल 2013-14 के बाद से जीडीपी के मुकाबले रक्षा खर्च लगातार कम हो रहा है। 2013-14 में रक्षा बजट जीडीपी का 1.79 प्रतिशत था जो पिछले साल के बजट में घटकर 1.62 फीसदी हो गया। इस साल के बजट में तो रक्षा के लिए जीडीपी के 1.57 प्रतिशत का ही प्रावधान किया गया है, जबकि जरूरत के हिसाब से यह जीडीपी का कम से कम ढाई-तीन प्रतिशत तो होना ही चाहिए।


बड़ी सेना, छोटा बजट
भारत की सेना दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सेना है, लेकिन हमारे यहां रक्षा बजट में जीडीपी का हिस्सा पाकिस्तान से भी कम है। रक्षा पर इजरायल सबसे ज्यादा जीडीपी का 5.2 फीसदी हिस्सा खर्च करता है, जबकि रूस में यह आंकड़ा 4.5 प्रतिशत, अमरीका में 4, चीन में 2.5 और पाकिस्तान रक्षा पर अपनी जीडीपी का 3.5 प्रतिशत हिस्सा खर्च करता है।

पहले से नहीं हैं पूरे संसाधन
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि देश के पश्चिम व उत्तर-पूर्वी मोर्चों पर लगातार बढ़ रहे खतरे के मद्देनजर भी रक्षा बजट में जीडीपी के कम से कम ढाई फीसदी हिस्से की दरकार है, लेकिन सरकार का इस ओर ध्यान नहीं देना अचम्भित करने वाला है। आज देश की तीनों सेनाओं के पास आसन खतरे के मुकाबले संसाधनों की कमी को तो संसदीय मामलों की समिति तक स्वीकार कर चुकी है। हालात पर नजर डालें तो थल सेना के पास असॉल्ट राइफल्स, मशीन गन्स, बुलैट प्रूफ जैकेट, हेलमेट और तोपों तक की कमी है। वायुसेना लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही है। नतीजन 41.5 स्क्वाड्रन की जगह महज 33-34 स्क्वाड्रन से काम चलाया जा रहा है। नौसेना के पास युद्धपोत व पनडुब्बियों की कमी किसी से छिपी नहीं है। वायुसेना और नौसेना के पास मौजूदा संसाधन बीस से तीस साल पुराने हैं। इन्हें लगातार अपडेट करके काम चलाया जा रहा है। ऐसे में रक्षा बजट में वांछित बढ़ोतरी समय की मांग भी है।


आधुनिकीकरण के लिए नाकाफी
वर्ष 2018-19 के आम बजट में रक्षा के लिए 2,95,511.41 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। रक्षा बजट में सेनाओं के आधुनिकीकरण के लिए पूंजीगत व्यय मद में खर्च किया जाता है, लेकिन इसमें महज 99,947 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार जिस तरह से सैन्य साजो सामान की कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है, उस हिसाब से यह राशि नाकाफी है। बजट में हालांकि डिफेंस इंडस्ट्री कोरिडोर और रक्षा उत्पादन नीति बनाने की घोषणा भी की गई है, लेकिन इसका रोडमैप नहीं होने से सवाल उठ रहा है कि इसे लागू कब और कैसे किया जाएगा।

Saturday, January 6, 2018

यूं पकड़ में आया चारा घोटाला

सबसे पहले पश्चिम सिंहभूम जिले में पकड़ में आया चार घोटाला एकीकृत बिहार के कई अन्य जिलों में भी सामने आया। कड़ी से कड़ी जुड़ती गई और घोटाले ने बिहार में राजनीतिक भूचाल ला दिया।



राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया और बिहार ही नहीं देश के फायरब्रांड नेता लालू प्रसाद यादव को जिस चारा घोटाले में रांची की सीबीआई मामलात की विशेष अदालत ने साढ़े तीन साल की सजा सुनाई है, उस मामले के सामने आने की कहानी भी बड़ी रोचक है। अविभाजित बिहार के इस बहुचर्चित घोटाले का पर्दाफाश पश्चिम सिंहभूम जिले से हुआ था। घोटाले का पर्दाफाश करने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अमित खरे 1996 में पश्चिम सिंहभूम जिले में उपायुक्त के पद पर तैनात हुए ही थे। उन्होंने उपायुक्त का पदभार संभालने के बाद चाईबासा कोषागार से फर्जी निकासी की तह में जाकर मामले का खुलासा किया था।

चारा घोटाला उजागर करने वाले आईएएस अधिकारी अमित खरे इन दिनों झारखंड के विकास आयुक्त हैं

खुलती चलती गई परतें 

खरे ने 27 जनवरी 1996 की सुबह ठिठुराती सर्दी में ब्रिटिश जमाने में बने भवन के एक छोटे से कोने में स्थित ट्रेजरी, पशुपालन विभाग के दफ्तर व पशुओं के फार्म हाउस पर छापा मारा। उन्होंने बिलों को जांचना शुरू किया, तो वे चौंक गये। सभी बिलों में 99 लाख रुपए की राशि ही भरी हुई थी। सभी बिलों पर एक ही आपूर्तिकर्त्ता का उल्लेख देख वे चौंक गए। खरे ने जिला पशुपालन अधिकारी व विभाग के कर्मचारियों को पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन सभी कर्मचारी भाग गए। इससे उनका संदेह गहरा गया। जब उन्होंने कैश बुक, बैंक ड्राफ्ट और दस्तावेज सम्भाले तो मामले की परतें खुलती चली गई। उन्होंने पशुपालन विभाग और उससे जुड़े सभी दफ्तरों को सील करवा दिया। बिलों के भुगतान पर रोक लगा दी। सभी दस्तावेज पुलिस थानों में सुरक्षित रखवा दिए, ताकि रिकॉर्ड्स से छेड़छाड़ न हो। सिंहभूम जैसा घोटाला एकीकृत बिहार के कई जिलों में सामने आया। कड़ी से कड़ी जुड़ती गई और घोटाले ने बिहार में राजनीतिक भूचाल ला दिया। फर्जीवाड़ा उजागर करने वाले आईएएस अमित खरे अभी झारखंड में विकास आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं।

ऐसे हुई सीबीआई जांच
11 मार्च 1997 को पटना उच्च न्यायालय ने सीबीआई को चार माह के भीतर चारा घोटाले की जांच के निर्देश दिए थे। 19 मार्च को 1997 को उच्चतम न्यायालय ने पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एसएन झा और एसजे मुखोपाध्याय की खंडपीठ को सीबीआई जांच की निगरानी करने का हुकम दिया। घोटाले में उस वक्त मुख्यमंत्री रहे लालू यादव समेत 16 लोगों को कारावास की सजा सुनाई गई है। ऐसे दो अन्य मामलों में लालू के खिलाफ सीबीआई मामलों की अदालत में केस विचाराधीन है।

सजा सुनने के बाद रांची की सीबीआई अदालत से बाहर आते लालू यादव

सातवीं बार जेल गए हैं लालू
चारा घोटाले से जुड़े विभिन्न मामलों में लालू यादव 7वीं बार जेल गए हैं। सबसे पहले 30 जुलाई 1997 को वे जेल गए और 135 दिन अंदर रहे। इसके बाद 28 अक्टूबर 1998 को 73 दिनों के लिए, तीसरी बार पांच अप्रैल 2000 को 11 दिनों के लिए, चौथी बार 28 नवंबर 2000 को एक दिन के लिए, पांचवीं बार 26 नवम्बर को 23 दिनों के लिए, छठी बार 3 अक्टूबर 2014 को 70 दिनों के लिए जेल गए। सातवीं बार वे 23 दिसंबर 2017 से जेल में हैं।

मुसीबत भरी है जनवरी लालू के लिए
लालू के लिए जनवरी का महीना मुसीबत भरा है। इसी महीने के अंत तक चारा घोटाले से जुड़े दो अन्य मामलों में  भी सीबीआई का फैसला आना है। जबकि एक अन्य मामले में आगामी मार्च में फैसला आएगा। इन सभी मामलों में लालू आरोपी है।

Friday, December 29, 2017

जब एक ‘बहादुर’ पड़ा था दुश्मन के लाव-लश्कर पर भारी

सुरेश व्यास
एक बहादुर की गर्जना विदा होते साल 2017 के साथ ही शान के साथ शांत हो गई। ये वो बहादुर था, जो ऊंची पहाड़ियों पर बैठे दुश्मन और उसके लाव-लश्कर पर अकेला ही भारी पड़ा था। ‘बहादुर’ की गर्जना भर से दुश्मन को दुम दबाकर भागना पड़ा।

जी हां, हम बात कर रहे हैं भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान मिग-27 की, जिसकी अचूक मारक क्षमता ने भारत में उसे ‘बहादुर’ नाम से ख्याति दिलाई और यही बहादुर नाटो सेनाओं के लिए ‘फ्लोगर’ यानी सफाया करने वाला अथवा कोड़े मारने वाला कहलाया। 

भारतीय वायुसेना में रूस निर्मित यह लड़ाकू विमान 1980 के दशक में शामिल हुआ था, लेकिन इसका असली इस्तेमाल 1999 में हुए भारत-पाकिस्तान के करगिल युद्ध में सामने आया। इस युद्ध में वायुसेना के ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में मिग-27 ने दुर्गम पहाड़ियों के बीच उड़ान भरकर दुश्मन के ठिकानों, सामग्री डिपो व सप्लाई मार्ग को नैस्तनाबूद कर दिया।
यूं ही नहीं कहलाए फ्लोगर
मिग यानी मिकोयान-गुरेविच विमान भारतीय वायुसेना की अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू विमान रहे हैं। हालांकि दुर्घटनाओं के कारण इन पर सवाल भी उठे और कई बार मिग विमानों को उड़न ताबूत तक कहा गया, लेकिन ये वास्तव में तकनीकी रूप से सक्षम नहीं होते तो न इन्हें नाटो सेनाएं फ्लोगर (सफाया करने वाला) मानती और न ही ये वायुसेना में बहादुर के नाम से प्रतिष्ठापित होते।
मजबूत इंजन, अचूक निशाना
शक्तिशाली इंजन ने मिग-27 को एक खास तरह का लड़ाकू विमान बनाया। इन विमानों में लगे ऑटोमेटिक फ्लाइंग कंट्रोल सिस्टम, अटैक इंडीकेटर्स और इन-बिल्ट लेजर गाइडेड सिस्टम के कारण बहादुर को दुनिया का सशक्त एयर टू ग्राउंड अटैक फाइटर जेट माना गया। देश में विभिन्न मौकों पर इन विमानों ने अपनी क्षमता को साबित भी किया। करगिल युद्ध इसका प्रमुख उदाहरण माना जा सकता है।
हासिमारा में आखिरी उड़ान
वायुसेना की लगभग तीन दशक की सेवा के बाद मिग-27 उम्रदराज होकर विदा हो रहे हैं। पश्चिम बंगाल के हासिमोरा एयरबेस से मिग-27 ने आखिरी उड़ान भरी। 

मिग-21 विमानों को चरणबद्ध तरीके से वायुसेना के लड़ाकू विमान बेड़े से विदा किया जा रहा है। अब भी देश के विभिन्न अग्रिम मोर्चों पर अपग्रेडेड मिग-27 गर्जना कर रहे हैं और अगले डेढ़ दो साल में पूरी तरह वायुसेना से विदा हो जाएंगे।
अब भी चालीस
दो साल पहले तक वायुसेना के बेड़े में अपग्रेडेड समेत 87 मिग-27 विमान थे। अवधि पूरी होने के कारण इन्हें फेज आउट किए जाने के बाद अब भी लगभग 40 मिग-27 वायुसेना के पास हैं। इन्हें धीरे धीरे सेवा से हटा लिया जाएगा, लेकिन देश के प्रमुख शहरों में इनकी डम्मी मिग-27 की गौरव गाथा को जीवंत बनाए रखेगी।

Wednesday, December 27, 2017

गुजरात के बाद गलफांस बने राजस्थान के उप चुनाव

भाजपा मानकर चल रही थी कि गुजरात में उसे अपार बहुमत मिल जाएगा और वह उसका फायदा राजस्थान के उपचुनाव में भी लेगी। लेकिन अब उलटा हो चुका है।


-सुरेश व्यास
जयपुर. गुजरात चुनावों के नतीजों के बाद राजस्थान में होने वाले दो संसदीय व एक विधानसभा क्षेत्र के उप चुनाव सत्ताधारी भाजपा के लिए गलफांस बन गए हैं। भाजपा को सरकार के प्रति असंतोष ही नहीं,बल्कि जातिगत समीकरणों ने भी उलझन में डाल रखा है। कांग्रेस प्रत्याशी चयन के मामले में भाजपा को मानसिक दबाव में पहले ही ला चुकी है। वहीं खुद, भाजपा को स्थानीय स्तर पर नेताओं की खींचतान ने परेशान कर रखा है।
राजस्थान में अलवर व अजमेर संसदीय क्षेत्रों में सांसद महंत चांदनाथ और सांवरलाल जाट तथा भीलवाड़ा जिले की मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर भाजपा विधायक कीर्तिकुमारी के निधन के कारण उपचुनाव होने हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने इन उपचुनावों की तारीख अभी घोषित नहीं की है, लेकिन आयोग के सामने फरवरी तक इन तीनों सीटों पर चुनाव करवाने की संवैधानिक मजबूरी है। ऐसे में माना जा रहा है कि आयोग कभी भी इन तीनों क्षेत्रों में उप चुनाव की घोषणा कर सकता है।
चुनाव आयोग हालांकि अन्य राज्यों में हुए उपचुनावों के साथ ही राजस्थान के तीनों क्षेत्रों की तारीख भी घोषित कर सकता था,  लेकिन राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इसमें भी गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीखों में देरी की तरह ही कुछ हुआ है। भाजपा मानकर चल रही थी कि गुजरात में उसे अपार बहुमत मिल जाएगा और वह उसका फायदा राजस्थान के उपचुनाव में भी लेगी। लेकिन अब उलटा हो चुका है।

अलवर का अड़ंगा
बदले हुए सियासी समीकरणों में भाजपा के लिए तारीखों की घोषणा से पहले प्रत्याशी चयन भी एक बड़ी मुसीबत है। अलवर में कांग्रेस पहले ही भाजपा के नहले पर दहला मार गई। कांग्रेस ने डॉ. कर्णसिंह यादव को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। उन्हें पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी के नजदीकी जाने वाले पूर्व राजपरिवार के सदस्य भंवर जितेंद्र सिंह का समर्थन भी है। जबकि भाजपा किसी यादव प्रत्याशी की खोज में ही रह गई। भाजपा हालांकि श्रम मंत्री जसवंत यादव को सामने उतार सकती है, लेकिन उसके सामने वोटों के बंटवारे के खतरे के साथ साथ सांसद रहे स्व. चांदनाथ के समर्थकों की नाराजगी का भय भी है। भाजपा अलवर जिले में पहले से अल्पसंख्यकों के निशाने पर है। ऐसे में यादव व अल्पसंख्यक मतों की नाराजगी ने उसे उलझा रखा है। रही सही कसर, उसके बड़बोले विधायक ज्ञानदेव आहूजा के नित नए सामने आ रहे विवादित बयान पूरी कर रहे हैं।
अजमेर में अजीब दिक्कत
इसी तरह अजमेर संसदीय क्षेत्र में भाजपा असमंजस में है। उसे दिक्कत है कि पूर्व सांसद स्व. सांवरलाल जाट के परिवार को टिकट दें तो परेशानी और न दें तो परेशानी। भाजपा जाट मतों के सहारे इस सीट को जीतना चाहती है, लेकिन स्व. सांवरलाल जाट के परिवार को टिकट देने से भी उसके सामने जाट वोट बंटने का खतरा है और न देने पर भी यह खतरा खत्म नहीं होता। कांग्रेस ब्राह्मण के साथ जाट प्रत्याशी पर भी दाव खेलने की फिराक में है, लेकिन वह पहले भाजपा का इंतजार कर रही है। कांग्रेस इस भरोसे भी है कि किसान महापंचायत ने अजमेर में अपना निर्दलीय प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी है तो उसे इसका फायदा भाजपा के वोटों में बंटवारे से होगा। ऐसे में वह तो निश्चिंत है, लेकिन भाजपा के माथे से चिंता की सलवटें दूर होने का नाम नहीं ले रही।
मांडलगढ़ की मझधार
रहा सवाल भीलवाड़ा की मांडलगढ़ विधानसभा सीट का तो यहां भी भाजपा ही ज्यादा परेशानी में है। भाजपा को इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखने की चिंता है। कांग्रेस के पास तो यहां खोने के लिए कुछ है नहीं, लेकिन क्षेत्र के जातिगत समीकरणों ने कांग्रेस नेताओं की बांछें खिला रखी है। इस क्षेत्र से राजपूत मतदाता हालांकि काफी प्रभाव रखते हैं, लेकिन ब्राह्मण मतदाता भी निर्णायक भूमिका में रहते हैं। गैंगस्टर आनंदपाल एनकाउंटर मामले के बाद से राजपूत समाज में भाजपा के प्रति नाराजगी ने भाजपा को पहली ही चिंता में डाल रखा है। ऐसे में कांग्रेस की कोशिश इस नाराजगी को भुनाने के साथ ब्राह्मण पर दाव खेलने की है। क्षेत्र में गुर्जर मतदाता भी बड़ी संख्या में है। वे आरक्षण के मुद्दे पर अनमने हैं। इसका खामियाजा भी भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। कांग्रेस ने इसके लिए पहले ही अपने विधायक धीरज गुर्जर को धंधे लगा रखा है। ब्राह्मण मतदाताओं के लिए कांग्रेस ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव डॉ. सीपी जोशी को मोर्चा सम्भलाया है।


चिंता विधानसभा चुनाव की

राजस्थान के तीनों उप चुनाव न सिर्फ संसद, बल्कि विधानसभा के लिए भी अहम है। अभी राजस्थान की सभी 25 सीटों पर भाजपा का कब्जा है। भाजपा इसे बरकरार रखना चाहती है। इसका असर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों पर भी पड़ेगा। प्रदेश की भाजपा सरकार के लिए यह चुनावी साल है। दिसम्बर 2018 में यहां विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन भाजपा अभी से राज्य सरकार के प्रति पनप रहे  असंतोष से चिंता में डूबी है। फिर जातिगत समीकरण भी उसके पक्ष में नजर नहीं आ रहे। बावजूद इसके भाजपा उपचुनावों के जरिए अपना अपर हैंड रखने की फिराक में है, ताकि विधानसभा चुनावों के दौरान मानसिक तनाव से मुक्त रहे। भाजपा की परेशानी है कि मोदी मैजिक उतर रहा है। प्रदेश में हुए स्थानीय निकाय व पंचायत चुनावों में कांग्रेस का मत प्रतिशत बढ़ा है। हाल ही निकाय  व पंचायतों के उपचुनाव में भी कांग्रेस ने भाजपा की जमीन खिसकाई है।

सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, अब सलेक्टिव टार्गेटिंग

काफी कारगर है भारतीय थल सेना का नया फंडा

-सुरेश व्यास
भारतीय सेना ने पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर पीट दिया। रावलकोट इलाके में पाकिस्तानी सेना की एक अस्थाई चौकी ध्वस्त हो गई। तीन पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। एक अब भी आखिरी सांसे गिन रहा है। भारतीय सेना के पांच कमांडो ढाई सौ से तीन सौ मीटर तक पाकिस्तानी इलाके में घुसे। कमांडो कार्रवाई की और दस मिनट में खेल खत्म। 

यह सब 24 दिसम्बर को हुआ। पाकिस्तानी सेना ने भी माना कि भारतीय फौज घर में घुस कर मार गई। पाकिस्तान की की प्रचार इकाई इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशन (आईएसपीआर) ने बाकायदा ट्वीट के जरिए इसकी जानकारी दी। (हालांकि अब पाकिस्तान इससे मुकर रहा है और कहा जा रहा है कि उसके सैनिक लैंडमाइन ब्लास्ट यानी बारूदी सुरंग फटने से मारे गए।) घर में घुसकर पाकिस्तानी फौज को मारने की इस घातक कमांडो कार्रवाई को लोग भी सर्जिकल स्ट्राइक मानते रहे। लेकिन, यह सर्जिकल स्ट्राइक नहीं सलेक्टिव टारगेटिंग थी। सलेक्टिव टारगेटिंग यानी फौजी भाषा की नई टर्म। 

टिट फॉर टेट
दरअसल, सलेक्टिव टारगेटिंग भारतीय सेना का 'टिट फॉर टेट' (जैसे को तैसा) एक्शन था। पाकिस्तानी सेना की बॉर्डर एक्शन टीम (बेट) ने 23 दिसम्बर को कश्मीर के राजौरी सेक्टर में घात लगाकर हमला किया। एक मेजर समेत चार भारतीय शहीद हुए। भारतीय सेना ने सलेक्टिव टारगेटिंग की और पाकिस्तान से हाथों हाथ बदला ले लिया। 


‘घातक कार्रवाई’
भारतीय सेना की एक यूनिट के घातक दस्ते ने यह कार्रवाई की। हर सैन्य यूनिट में ऐसे घातक दस्ते होते हैं। इसके प्रशिक्षित कमाण्डो तुरंत कार्रवाई करते हैं। फिर लौट आते हैं। इस तरह के एक्शन का फैसला भी स्थानीय स्तर भी होता है। पाकिस्तान में ढाई सौ-तीन सौ मीटर अंदर जाकर मार करने का सलेक्टिव टारगेटिंग एक्शन भी इसी का नतीजा था। सेना की 25वीं डिविजन के स्तर पर फैसला हुआ और कार्रवाई अंजाम दे दी गई। डिविजनल मुख्यालय के निर्देश पर घातक कमांडों ने पाकिस्तान सेना की 2-पीओके ब्रिगेड की 59वीं बलूच यूनिट के सैनिकों को मार गिराया। चौकी ध्वस्त कर डाली।

बहुत कारगर तरीका
रक्षा विशेषज्ञों की राय में पाकिस्तान की हरकतों का जवाब देने के लिए सलेक्टिव टारगेटिंग एक कारगर तरीका है। सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम के लिए सेना मुख्यालय की अनुमति लेनी पड़ती है। इसमें स्थानीय स्तर पर ही फैसला हो जाता है। सलेक्टिव टारगेटिंग के ताजा मामले से पाकिस्तान को सबक लेना चाहिए। भारतीय फौज ने पिछले कुछ समय से 'टिट फॉर टेट' की रणनीति अपना रखी है। इसके अच्छे नतीजे भी सामने आए हैं। आज तक भारत ने पाकिस्तानी सेना की बेट का बहुत कम जवाब दिया है। लेकिन टिट फॉर टेट के लिए सलेक्टिव टार्गेटिंग की धार का लगातार इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

सकते में है पाकिस्तान
भारतीय सेना के सलेक्टिव टार्गेट कार्रवाई से पाकिस्तान किस कदर सकते में है, इसका अंदाजा उसके रोजाना बदल रहे बयानों से लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं,पाकिस्तान ने सकते में आकर अपने फौजियों की मौत का मुद्दा भारत के साथ हर सप्ताह मंगलवार को होने वाली डीजीएमओ यानी डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन्स की बैठक में भी नहीं उठाया।


नापाक इरादों पर चोट
पाकिस्तान की सेना ने आतंक को बढ़ावे के लिए जम्मू-कश्मीर में ही सबसे ज्यादा सक्रियता दिखाई है। आज भी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में आतंककारियों के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं। पाकिस्तान की सेना आतंकियों की घुसपैठ करवाने के लिए कवर फायर करती है। हालांकि कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों की सख्ती के चलते आतंकियों की कमर टूटी है। अब तक दो सौ से ज्यादा आतंकी इस साल भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराए हैं, लेकिन पाकिस्तान है कि मानता ही नहीं। इसका सबसे बड़ा सबूत इस साल पाकिस्तान की ओर से जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के पास लगातार तोड़े जा रहे संघर्ष विराम की घटनाओं में आई तेजी है। 

रिकार्ड संघर्ष विराम टूटने का
अकेले वर्ष 2017 में संघर्ष विराम तोड़ने की घटनाओं में 230 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले साल जहां संघर्ष विराम तोड़ने की 228 घटनाएं हुई थी, वहीं इस साल यह आंकड़ा बढ़कर 800 के पार जा चुका है। इन हालात में पाकिस्तान के लिए भारतीय सेना की नई टर्म सिलेक्टिव टारगेटिंग एक अलार्म है। पाकिस्तान को सावधान हो जाना चाहिए।


Monday, December 25, 2017

रिश्तों के बीच में शीशे की दीवार!


मानवता नहीं, पाकिस्तान की नौटंकी है ये

-सुरेश व्यास

 जासूस बताकर भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को फांसी के फंदे के मुहाने तक पहुंचाने वाले पाकिस्तान का असली चेहरा एक बार फिर बेनकाब हो गया है। जाधव की मां अवंति व पत्नी चेतनकुल की जिस तरह मुलाकात करवाई गई, उसे देखकर कोई नहीं कह सकता कि पाकिस्तान ने इस मुलाकात के बहाने मानवीयता का मुजाहिरा किया है। जिस तरह संगीनों के साए में जाधव की मां व पत्नी को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की बिल्डिंग तक लाया गया और जिस तरह 22 महीने से पाकिस्तान की जेलों में बंद जाधव को अपनों के सामने किया गया, वह पाकिस्तान की नौटंकी से बढ़कर कुछ नहीं था। पाकिस्तान भले ही इस मुलाकात के पीछे मानवीयता की दुहाई देता रहे, लेकिन इससे बढ़कर कोई अमानवीय तस्वीर हो नहीं सकती कि मां अपने लाल के सिर पर हाथ फेरने से भी महरूम रह जाए और पत्नी मौत के मुहाने पर खड़े अपने अपने पति से नजरें दो चार न कर सके।

जाधव की मां व पत्नी की मुलाकात शीशे की दीवार बीच में रखकर करवाई गई। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के अधिकारी शीशे के उस पार थे, लेकिन भारतीय राजनयिक को इस मुलाकात से इतना दूर रखा गया कि वह इनकी बात तक नहीं सुन सका। शीशे की दीवार के पीछे बैठे जाधव ने अपनी मां और पत्नी से जरिए टेलीफोन बात की। हां, वे एक दूसरे को देख जरूर सकते थे, लेकिन छू नहीं सकते।







पाकिस्तान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस मुलाकात के बाद बड़ी बड़ी डींगें हांकी। कहा कि मुलाकात के लिए आधे घंटे का वक्त ही निर्धारित था, लेकिन जाधव की मां व पत्नी की गुजारिश पर दस मिनत की अवधि बढ़ाई गई। पाकिस्तान ने यह सब मानवीयता के नाते किया। शीशे की दीवार के बारे में उनका कहना था कि सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा करना जरूरी था। समझ में नहीं आता कि एक मां व अपनी पत्नी से किसी ‘मुजरिम’ को क्या खतरा हो सकता है कि उन्हें आमने-सामने मुलाकात करवा पाने में नाकाम पाकिस्तान बेशर्मी ने अपनी मानवीय सोच की डींगें हांक रहा है।
 सवाल यह है कि आखिर पाकिस्तान को इस मुलाकात के लिए हामी किस मजबूरी में भरनी पड़ी? क्यों उसे जाधव की मां व पत्नी को वीजा देना पड़ा? काउंसलर एक्सेस का वादा करके भी पाकिस्तान ऐनवक्त पर पीछे क्यों हट गया? इन सवालों के पीछे न सिर्फ पाकिस्तान पर जाधव मामले को लेकर अन्तरराष्ट्रीय दबाव है, बल्कि वह मामले की सुनवाई कर रहे अन्तराष्ट्रीय अदालत- इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के सामने यह साबित करने की कोशिश करना चाह रहा है कि वह वैश्विक नियमों के पालन के लिए प्रतिबद्ध है। दरअसल, पाकिस्तान के हुक्मरान अच्छी तरह जानते हैं कि जाधव के परिवार और भारतीय राजनयिकों से मुलाकात न करवाना वियना संधि का उल्लंघन है। वियना संधि के मुताबिक पाकिस्तान जाधव को काउंसलर एक्सेस देने के लिए बाध्य है, लेकिन उसने बहुत ही होशियारी के साथ इससे बचने की कोशिश की है।




           पाकिस्तान मामलों के जानकार कहते हैं कि पाकिस्तान ने एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश की है। एक तो उसने दुनिया को यह बताने की कोशिश की है कि वह एक जिम्मेदार राष्ट्र है तो अन्तरराष्ट्रीय संधियों के तहत मानवाधिकारों का संरक्षण करने के लिए प्रतिबद्ध है, दूसरा उसने आईसीजे के सामने अपना पक्ष मजबूत करने की नाकाम कोशिश की है। वास्तव में पाकिस्तान मानवीय आधार पर इस मुलाकात का पक्षधर था तो पत्नी व मां तथा जाधव के बीच शीशे की दीवार न होती।






पाकिस्तान मामलों के एक जानकार ने कहा कि पाकिस्तान से इस मुलाकात के बहाने भारत के साथ सम्बन्ध सुधारने का एक बेहतरीन मौका खो दिया है। पाकिस्तान में जिस तरह के राजनीतिक हालात बन रहे हैं और पाकिस्तानी सेना निर्वाचित सरकार पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं, उस स्थित में पाकिस्तान पूरा नहीं थोड़ा सा ही मानवीय नजरिया रखता तो रिश्तों में कुछ मिठास घोलने की दिशा में बढ़ा जा सकता था, लेकिन आज की मुलाकात के बाद भारतीय जनमानस में पाकिस्तान के प्रति कटुता और बढ़ेगी ही।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जाधव मामले में पाकिस्तान ने मां-पत्नी से मुलाकात के बारे में महज रस्म अदायगी की है। न तो इस मुलाकात में पाकिस्तान का मानवीय चेहरा सामने आ सका और न ही भारत के साथ सम्बन्ध सुधारने की उसकी मंशा।






























#कुलभूषण #जाधव#Pakistan#

Friday, December 22, 2017

अब सेनाध्यक्ष भी बोलने लगे कूटनीति की भाषा!


-सुरेश व्यास
जयपुर। भारतीय थलसेना के मुखिया जनरल बिपिन रावत ने पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष के पाकिस्तान संसद में दिए गए बयान का करारा जवाब दिया है। उन्होंने शुक्रवार को बाड़मेर-जैसलमेर से सटी भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट मीडिया से बातचीत में कहा कि शांति तो सभी चाहते हैं, लेकिन आतंकवाद को समर्थन बंद किए बिना कोई कैसे शांति वार्ता की कल्पना कर सकता है।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तानी थल सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा ने पाकिस्तानी सिनेट में सरकार को भारत के साथ शांति वार्ता करने की सलाह देते हुए कहा है कि पाकिस्तानी सेना इस मामले में सरकार को पूरा समर्थन देगी। इसी मुद्दे पर पश्चिम मोर्चे के दौरे पर आए भारतीय थलसेनाध्यक्ष जनरल रावत से पूछा गया तो उन्होंने बेबाकी के साथ जवाब दिया। उनका कहना था कि शांति हम भी चाहते हैं, लेकिन यह सभी देख रहे हैं कि पाकिस्तान कश्मीर में क्या कर रहा है। आतंक को समर्थन बंद किए बिना शांति कैसे सम्भव है।

हालांकि सेनाध्यक्ष इस तरह के राजनीतिक-कूटनीतिक जवाबों से कन्नी काटते हैं, लेकिन जनरल रावत ने एक बार फिर बेबाकी के साथ कूटनीतिक सवाल का जवाब देने में भी कोई हिचक नहीं दिखाई। उन्होंने एक दिन पहले भारतीय विदेश मंत्रालय के इस सम्बन्ध में आए जवाब का ही समर्थन किया है, लेकिन थलसेनाध्यक्ष की इस तरह की बेबाकी पहली बार नहीं है। पाकिस्तान में तो माना कि सरकार सेना के इशारे के बिना नहीं चल सकती और दुनिया जानती है कि चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार को भी पाकिस्तान में कैसे सेना का पिट्ठू बनकर काम करना पड़ता है, लेकिन भारत में सेनाध्यक्ष की ऐसे राजनीतिक मामलों में बेबाकी कम ही नजर आती है। आमतौर पर सेनाध्यक्ष यह कहते हुए बात टाल जाते हैं कि सेना अपना काम बखूबी कर रही है। वह किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम है। शांति वार्ता का काम सरकार का है।


जनरल रावत ने न सिर्फ पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष को करारा जवाब दिया, बल्कि बातचीत में यह भी साफ कह दिया कि सेना कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ सख्ती को जारी रखेगी। उन्होंने कहा कि सेना ही नहीं कश्मीर घाटी में तैनात अर्द्धसैनिक बलों के जवान भी आपसी सामंजस्य के साथ आतंककारियों के खात्मे में जुटे हैं। यह काम लगातार जारी रहेगा। हालांकि उन्होंने कश्मीर में पत्थरबाजों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के सवाल का गोलमाल जवाब दिया।

राजस्थान से सटी भारत-पाकिस्तान के सामने बहावलपुर में चल रहे पाकिस्तान सेना के युद्धाभ्यास और बाड़मेर-जैसलमेर में भारतीय सेना के युद्धाभ्यास ‘हमेशा विजयी’ के बारे में पूछे जाने पर् उन्होंने कहा कि वे अपना काम कर रहे हैं और हम हमारा अभ्यास। सेना इस तरह का अभ्यास सर्दियों में करती रहती है। भारतीय सेना की दक्षिण कमान का यह द्विवार्षिक अभ्यास भारत की सामरिक रणनीति के लिए अहम है।

थलसेनाध्यक्ष ने कहा कि सेना के पास हथियारों की कोई कमी नहीं है। इन्सास के बाद सेना को हालांकि कोई नई असॉल्ट राइफल नहीं मिली है, लेकिन सरकार ने राइफल खरीद के लिए सेना को हरी झंडी दे रखी है। थल सेना ने अपना सहमति पत्र जारी कर दिया है और राइफल्स का परीक्षण किया जा रहा है। जो राइफल सेना के अनुरूप होगी, उसकी खरीद की जाएगी।

पाक से सटी सीमा पर भारतीय फौज की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’




सुरेश व्यास

चारों ओर रेत का समंदर...सन्नाटा तोड़ते सांय-सांय करती हवा के झोंके और बहुत ही नजदीक नजर आ रही अन्तरराष्ट्रीय सीमा। हालांकि आदमजात का कोई नामोनिशान नजर नहीं आ रहा था, इस रेतीले इलाके में, लेकिन थोड़ी सी दूरी पर कुछ झाड़ियां हिली। आसमान से कुछ लोग उतरते नजर आए। पलक झपकी ही नहीं थी कि समूचा इलाका गोलियों की तड़तड़ाहट और धमाकों से गूंज उठा। चारों ओर धूल और धुएं के गुबार। लगभग दस मिनट के बाद फिर वही मरघट सी शांति और सांय सांय करती हवा के झोंकों के बीच विजयी मुस्कान बिखेरते सेना के जवान।
ये दृश्य नजर आया राजस्थान के बाड़मेर-जैसलमेर जिलों से सटी भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट। मौका था थल सेना की पुणे स्थित दक्षिणी कमान के द्विवार्षिक युद्धाभ्यास का। इसे नाम दिया गया- ‘हमेशा विजय’ और इसमें पहली बार सेना के जवानों ने सर्जिकल स्ट्राइक का नजारा पेश कर साबित किया कि भारतीय सेना के जवान दुश्मन को भीतर घुसकर भी नैस्तनाबूद करने में किस तरह सक्षम हैं।



संयोग या कुछ और...
ये संयोग ही कहा जाएगा कि आज ही के दिन एक साल पहले भारतीय फौज ने जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तान की सीमा चौकियों को ध्वस्त किया था और पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक का जमकर प्रचार किया गया। इस बहुचर्चित सर्जिकल स्ट्राइक की बरसी पर दक्षिणी कमान के कमाण्डो ने भारतीय थलसेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत की मौजूदगी में पश्चिमी मोर्चे पर सर्जिकल स्ट्राइक का ट्रेलर पेश कर कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर बैठे पाकिस्तानी सैन्याधिकारियों को यह संदेश देने की कोशिश की कि भारतीय फौज अब उन्हें 1971 की तरह टैंक ब्रिगेड के साथ रेगिस्तान के लोंगोवाला में घुसने का मौका ही नहीं देगी।
युद्धाभ्यास का सामरिक महत्व
दरअसल, भारतीय सेना थोड़े थोड़े अंतराल पर युद्धाभ्यास करती रहती है। इस बार जैसलमेर और बाड़मेर जिलों में स्थित सम्भवतः एशिया की सबसे बड़ी फील्ड फायरिंग रेंज में दक्षिणी कमान ने बड़ा युद्धाभ्यास किया है। इसमें कमान के लगभग तीन हजार से ज्यादा जवानों और अधिकारियों ने भाग लिया। युद्धाभ्यास हालांकि सेना के प्रशिक्षण का एक अहम हिस्सा है, लेकिन बदले हुए माहौल में आज सम्पन्न हुए युद्धाभ्यास का सामरिक महत्व कुछ अलग है।

कहां तक पहुंचा कोल्ड स्टार्ट
लगभग डेढ़ दशक पहले बदले गए सेना के युद्ध सिद्धान्त (वार डॉक्ट्रेन)- कोल्ड स्टार्ट की इस लगभग आखिरी कड़ी में सेना न सिर्फ कम समय में मोर्चे पर पहुंचने की रणनीति पर कामयाब हो रही है, बल्कि युद्धकाल में सेना के तीनों अंगों के साथ बेहतरीन सामंजस्य के प्रदर्शन से युद्ध को कम समय में ज्यादा मारक बनाने की कोशिशों को परवान चढ़ाने के प्रयास पर भी बहुत काम हो रहा है। युद्ध के मैदान में हथियारों के साथ तकनीक और खासकर बेहतरीन सर्विलांस उपकरणों के समुचित इस्तेमाल का पारंगतता हासिल करने की दिशा में भी ये युद्धाभ्यास खासे महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।


तैयारी नेटवर्क सेंट्रिक वार की
सेना ने ‘हमेशा विजय’ युद्धाभ्यास में भी वायुसेना के साथ बेहतर तालमेल का प्रदर्शन किया. वहीं नेटवर्क सेंट्रिक वारगेम ने इसे आधुनिकता के रंग में रंगने में कोई कसर नहीं छोड़ी। खुद थल सेनाध्यक्ष जनरल रावत ने भी कहा कि- ‘सेना और वायुसेना की यह सामंजस्य अद्भुत है।’ जनरल रावत ने लगातार दो दिन युद्धाभ्यास के दौरान मौजूद रहकर इसका बारीकी से न सिर्फ जायजा लिया, बल्कि खुद टैंक राइडिंग कर स्वदेश निर्मित बैटल टैंक अर्जुन-1 की क्षमताओं को भी परखा।


हर चुनौती के सामने को सक्षम

जनरल रावत ने कहा कि भारतीय फौज देश की सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से हर जरूरी कदम उठा रही है। हम किसी भी आपात स्थिति का सामना करने में सक्षम हैं। दक्षिण कमान के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डीआर सोनी का कहना था कि इस युद्धाभ्यास से बहुत कुछ सुखद अनुभव हुए हैं। इन अनुभवों के आधार पर भारतीय सेना खुद को हर प्रतिकूल परिस्थिति में भी दुश्मन को सबक सिखाने में खुद को सक्षम और मजबूत पाती है।